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सोनिया गांधी का केंद्र पर हमला: अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को बताया “मौत का वारंट”

सोनिया गांधी ने अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा पर केंद्र को घेरा, कहा—“पहाड़ियों के लिए मौत का वारंट”

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र की परिभाषा स्वीकार किए जाने के बाद विवाद तेज, कांग्रेस ने पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर चिंताएँ जताईं

नई दिल्ली, 03 दिसंबर 2025 — संवाददाता


कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बुधवार को केंद्र सरकार पर अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव को लेकर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यह फैसला पहले से ही खनन से प्रभावित इस पर्वत श्रृंखला के लिए “मौत का वारंट” साबित हो सकता है और इससे अवैध खनन को खुली छूट मिलेगी।


सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर को अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा पर केंद्र सरकार के रुख को स्वीकार कर लिया। नए मानक के अनुसार, “श्रृंखला में वे पहाड़ जो 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले हैं, उन पर खनन संबंधी कठोर प्रतिबंध लागू नहीं होंगे।” इस फैसले को लेकर राजनीतिक और पर्यावरणीय हलकों में बहस तेज हो गई है।

कांग्रेस ने सोनिया गांधी के लेख के अंश साझा किए, जिसमें उन्होंने लिखा, “गुजरात से लेकर राजस्थान और हरियाणा तक फैली अरावली श्रृंखला भारतीय भूगोल और इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहर है। मोदी सरकार ने अब लगभग इन पहाड़ियों के लिए मौत का वारंट जारी कर दिया है। पहले ही अवैध खनन से क्षतिग्रस्त हो चुकी पहाड़ियों में अब 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले हिस्सों पर प्रतिबंध नहीं रहेगा।”

उन्होंने आगे कहा कि यह निर्णय “अवैध खनन नेटवर्क और खनन माफिया के लिए खुला निमंत्रण” है, क्योंकि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा 100 मीटर की सीमा से नीचे आता है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकारी नीतियों में “पर्यावरण के प्रति गहरी उपेक्षा” दिखाई देती है।

सोनिया गांधी ने वनों की कटाई और वन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के विस्थापन को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की आत्मा के खिलाफ कदम बताया। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में किए गए संशोधन और वन संरक्षण नियम, 2022 को वापस ले।


उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ, जिसकी अध्यक्षता तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने की, ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अनुशंसाओं को स्वीकार किया। इनमें अरावली पहाड़ियों में सतत खनन के लिए दिशा-निर्देश और अवैध खनन रोकने के उपाय शामिल हैं।

न्यायालय ने मंत्रालय को सतत खनन के लिए प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार करने का निर्देश दिया है। यह योजना खनन योग्य क्षेत्रों की पहचान करेगी, पर्यावरण-संवेदनशील और संरक्षण-प्राथमिकता क्षेत्रों को चिह्नित करेगी, जहाँ खनन या तो पूरी तरह प्रतिबंधित होगा या केवल वैज्ञानिक कारणों से ही सीमित अनुमति दी जाएगी। इसके अलावा, योजना में खनन के बाद पुनर्वास और पुनर्स्थापन की स्पष्ट प्रक्रिया भी शामिल होगी।

आदेश के अनुसार, MPSM तैयार होने तक कोई नई खनन लीज जारी नहीं की जाएगी।


विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण पर व्यापक बहस देखने को मिल सकती है। पर्यावरण समूहों ने इस फैसले की समीक्षा की मांग की है, जबकि सरकार इसे विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का प्रयास बता रही है। कांग्रेस ने कहा है कि वह इस मुद्दे को संसद और जनता के बीच मजबूती से उठाएगी।

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