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Tag: न्यायिक समीक्षा

Presidential Reference verdict: राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करना असंवैधानिक
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Presidential Reference verdict: राज्यपाल-राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करना असंवैधानिक

भारत के संघीय ढांचे और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका पर नई बहस को जन्म देते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को कहा कि 8 अप्रैल के अपने पहले के निर्णय में जो राज्यपालों व राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर सहमति देने की समयसीमा तय की गई थी, वह संविधान और शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) के विरुद्ध है। पीठ ने यह भी कहा कि यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा उन समयसीमाओं का पालन न किया जाए तो 'डीम्ड असेंट' जैसा प्रावधान नहीं बनाया जा सकता। यह निर्णय Chief Justice of India B.R. Gavai की संविधान पीठ (जिन्होंने पीठ में Justices Surya Kant, Vikram Nath, P.S. Narasimha और Atul S. Chandurkar को शामिल किया) ने सुनाया। पीठ ने कहा कि अदालत द्वारा समयसीमा थोपना और 'डीम्ड असेंट' का सिद्धांत लागू करना गवर्नर/राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों का अन्यायपूर्ण अधिग्रहण है, जो संविधान के सिद्धा...
सुप्रीम कोर्ट ने BJP सांसद निशिकांत दुबे की टिप्पणी को बताया ‘गैर-जिम्मेदाराना’
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सुप्रीम कोर्ट ने BJP सांसद निशिकांत दुबे की टिप्पणी को बताया ‘गैर-जिम्मेदाराना’

सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की टिप्पणी को ‘गंभीर रूप से गैर-जिम्मेदाराना’ बताते हुए कहा कि ऐसी टिप्पणियां संवैधानिक अदालतों की भूमिका के प्रति अज्ञानता दर्शाती हैं। अदालत ने नफरत भरे भाषणों पर सख्त रुख अपनाने की भी बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक अदालतों की भूमिका को लेकर अज्ञानता दर्शाती है दुबे की टिप्पणी।   गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे द्वारा दिए गए विवादास्पद बयान को “गंभीर रूप से गैर-जिम्मेदाराना” करार दिया। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने कहा कि दुबे की टिप्पणी भारत की सर्वोच्च अदालत और उसके न्यायाधीशों की छवि को धूमिल करने का एक प्रयास है और यह ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति को दर्शाती है। दुबे ने कथित तौर पर कहा था कि “सुप्रीम कोर्ट देश को अराजकता की ओर ले जा रहा है” और “मुख्य न्याया...