
अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में अपने उपनेता राघव चड्ढा के पर कतर दिए हैं। उन्हें न केवल पदमुक्त कर दिया गया है, बल्कि पार्टी कोटे से उन पर बोलने पर भी पाबंदी लगा दी गई है।
हालांकि AAP के नेतृत्व के बीच आपसी कलह और असंतोष की परंपरा पुरानी है। प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के शुरुआती दौर से लेकर स्वाति मालीवाल तक, पार्टी ने कभी भी किसी को स्वतंत्र राजनीतिक पहचान नहीं बनाने दी। लेकिन चड्ढा का मामला बिल्कुल अनूठा है, क्योंकि वे बागी नहीं, बल्कि केजरीवाल के बेहद ख़ास और पार्टी के पोस्टर बॉय थे।
भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव भरे रंगमंच पर, शायद ही किसी का उदय राघव चड्ढा की तरह फिल्मी रहा हो। ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ आंदोलन की धूल भरी सड़कों से लेकर राज्यसभा के आलीशान गलियारों तक, चड्ढा आम आदमी पार्टी (AAP) की “नई उम्र” की राजनीति का चेहरा थे—वाक्पटु, स्टाइलिश और करिश्माई।
लेकिन, 2025 की चुनावी हार और दिल्ली आबकारी नीति मामले के बाद पार्टी जिस उथल-पुथल से गुज़र रही है, उसमें यह अरविन्द का “लाडला” आज हाशिए पर खड़ा है। राज्यसभा में उपनेता पद से उन्हें हटाना केवल एक संगठनात्मक फेरबदल नहीं है; यह एक स्पष्ट संकेत है कि उनके और पार्टी के बीच का पुल ढह चुका है।
राघव चड्ढा का राजनीतिक सफ़र हमेशा से अनुभवी राजनेताओं के लिए ईर्ष्या का कारण रहा है। सड़क स्तर की सक्रियता से उभरकर अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में तेज़ी से स्थान बनाया और राज्यसभा जैसे सर्वोच्च संसदीय मंच तक पहुंचे। 2019 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद वे दिल्ली विधानसभा पहुंचे और बाद में पंजाब में AAP की शानदार जीत के रणनीतिकार बने। बहुत दिनों तक लुटियंस दिल्ली में बस यही चर्चा होती थी: “अगर अरविंद केजरीवाल तक सीधे पहुंचना है, तो राघव चड्ढा के माध्यम से जाइए।”
लेकिन ‘दिल्ली आबकारी नीति’ मामले ने पार्टी का आंतरिक भूगोल बदल दिया। जहाँ मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे दिग्गज जेल की सलाखों के पीछे संघर्ष कर रहे थे, वहीं केजरीवाल की गिरफ़्तारी के दौरान चड्ढा का भारत से ग़ायब रहना पार्टी के लिए एक बड़ी टीस बन गया।
हालाँकि पार्टी ने आधिकारिक तौर पर ब्रिटेन में “विट्रेक्टोमी” (आंखों की सर्जरी) का हवाला दिया, लेकिन पार्टी के कठिन समय में लंदन से आई उनकी तस्वीरों ने कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश दिया कि वे मैदान छोड़कर भाग गए हैं।
“जब पार्टी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, तब उनका सबसे बड़ा ‘स्टार’ बैटल फ़ील्ड से ग़ायब था। राजनीति में ग़ैर-मौजूदगी सिर्फ़ एक शारीरिक स्थिति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक बयान समझा जाता है।”
संसद में उनकी कार्यशैली को लेकर भी प्रश्न उठे हैं। आलोचकों का आरोप है कि गंभीर नीतिगत बहसों के बजाय कुछ अवसरों पर हल्के-फुल्के या प्रतीकात्मक मुद्दों को प्रमुखता दी गई, जिससे संसदीय विमर्श की गंभीरता प्रभावित हुई।
सबसे तीखा प्रहार विपक्ष से नहीं, बल्कि अपनों की तरफ़ से आया। AAP मीडिया प्रमुख अनुराग ढांडा और दिल्ली के मंत्री सौरभ भारद्वाज की हालिया बयानबाज़ी ने पार्टी के उस दिखावटी “सब ठीक है” के मुखौटे को उतार दिया है। ढांडा की टिप्पणी कि संसद के क़ीमती समय का उपयोग “देश बचाने के संघर्ष” के बजाय “एयरपोर्ट कैंटीन में सस्ते समोसे” के लिए किया गया, एक बुनियादी मतभेद को दर्शाता है।
नेतृत्व को लगता है कि चड्ढा का ध्यान केवल “सॉफ़्ट पीआर” और जीवनशैली से जुड़े पॉपुलिस्ट मुद्दों पर है। पंजाब से राज्यसभा सांसद होने के नाते, यह अपेक्षा की जाती रही है कि वे राज्य के विशिष्ट मुद्दों—जैसे कृषि संकट, औद्योगिक चुनौतियाँ और बेरोज़गारी—को राष्ट्रीय मंच पर प्रभावी ढंग से उठाएँ।
चड्ढा के ख़िलाफ़ आरोप है कि उन्होंने चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ तृणमूल कांग्रेस द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। इसके अलावा, हाल के महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ उनके कंठ से एक शब्द नहीं फूटा। उन्होंने विपक्ष के वॉकआउट के दौरान सदन में मौजूद रहकर न केवल पार्टी अनुशासन को तोड़ा, बल्कि व्हिप का भी उल्लंघन किया।
सर्वविदित है कि जैसे ही 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में AAP ने अपना गढ़ भाजपा के हाथों गंवाया, आंतरिक दोषारोपण चरम पर पहुंच गया। जब मनीष सिसोदिया को पंजाब का प्रभार सौंपा गया—जो चड्ढा का कार्यक्षेत्र हुआ करता था—तो संदेश स्पष्ट था: नेतृत्व का भरोसा अब चड्ढा पर नहीं रहा।
जिस तरह राघव चड्ढा देश के ज्वलंत मुद्दों पर चुप्पी साधे रहे, पार्टी को नजरअंदाज किया और उन पर यह आरोप कि वे सत्ता से डर गए हैं—यह कितना सही है, यह कह पाना मुश्किल है। लेकिन यह पूरी तरह स्पष्ट है कि जब पार्टी को संकट के समय उनकी जरूरत थी, वे लगातार पार्टी से दूरी बनाए रहे। पार्टी, देश और राज्य के गंभीर मुद्दों पर उनकी चुप्पी के साथ-साथ संसद में लोकलुभावन मुद्दों को उठाकर सोशल मीडिया पर वायरल होने का उनका तरीका, यह दर्शाता है कि चड्ढा ने एक सोची-समझी रणनीति अपनाई थी। ऐसा लगता है कि उन्होंने डिजिटल मार्केटिंग के जरिए खुद को जनता, विशेषकर युवाओं के बीच एक ‘जनहितैषी आदर्श नेता’ के रूप में स्थापित करने का सचेत प्रयास किया।
फिलहाल, राजनीतिक गलियारों में चड्ढा का भविष्य चर्चा का सबसे ‘हॉट टॉपिक’ बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह चर्चा आम है कि क्या अब चड्ढा के आंगन में ‘कमल’ खिलेगा? वे भाजपा का दामन थामेंगे या किसी लंबे राजनीतिक अज्ञातवास की ओर प्रस्थान करेंगे, यह तो आने वाला समय ही स्पष्ट करेगा। लेकिन एक बात पूरी तरह साफ़ नजर आ रही है—आम आदमी पार्टी से उनकी विदाई अब केवल समय की बात रह गई है।

ग़ज़नफ़र एक प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, शोधकर्ता और मीडिया सलाहकार हैं। उनके पास पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है और उन्होंने विभिन्न मीडिया आउटलेट्स के साथ काम किया है। ग़ज़नफ़र की लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और सूचनात्मक है, जो उन्हें पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाती है। ग़ज़नफ़र की रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता उनके लेखन और शोध में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे विभिन्न विषयों पर लिखते हैं और विभिन्न संगठनों को मीडिया से सम्बंधित विषयों पर परामर्श प्रदान करते हैं।
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