
प्रयागराज, 22 नवंबर (केएनएन) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) अधिकारी जीएसटी व्यवस्था लागू होने से पहले पूरे किए गए काम पर कर, जुर्माना या ब्याज नहीं लगा सकते हैं।
इस मामले में एक कार्य ठेकेदार शामिल था जिसे जीएसटी अधिनियम के तहत वित्त वर्ष 2018-19 के लिए नोटिस प्राप्त हुआ था। समय पर जवाब देने में असमर्थता के कारण बाद में एक पक्षीय आदेश पारित किया गया।
ठेकेदार ने यह तर्क देते हुए आदेश को चुनौती दी कि विवादित भुगतान 2015-16 और 2016-17 के दौरान जल निगम के लिए निष्पादित कार्य से संबंधित है, जो मूल्य वर्धित कर (वैट) शासन द्वारा शासित अवधि है, न कि जीएसटी द्वारा। उन्होंने कहा कि उस समय आवश्यकतानुसार वैट पहले ही काटा जा चुका था।
न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल ने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद किया गया भुगतान अधिकारियों को पहले से किए गए लेनदेन पर अधिकार क्षेत्र नहीं देता है।
चूंकि कार्य अनुबंध और निष्पादन वैट प्रणाली के तहत हुआ, इसलिए मामला वैट अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आ गया।
कोर्ट ने कहा कि जीएसटी अधिकारी केवल जीएसटीआर-3बी और फॉर्म 26एएस के बीच विसंगतियों के कारण अधिकार नहीं ले सकते।
आदेश में कहा गया है, “एक बार जब रिकॉर्ड से पता चलता है कि याचिकाकर्ता ने जीएसटी से पहले जल निगम द्वारा आवंटित कार्य अनुबंध को निष्पादित किया है, तो बाद में भुगतान जीएसटी लगाने को उचित नहीं ठहरा सकता है।”
रिट याचिका की अनुमति दी गई, और एकपक्षीय जीएसटी आदेश को रद्द कर दिया गया।
(केएनएन ब्यूरो)

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