
बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में वोटिंग के बीच ‘एसआईआर’ विवाद छाया, 27 लाख मतदाता सूची से बाहर
152 सीटों पर मतदान, लेकिन मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े सवालों ने चुनावी माहौल को प्रभावित किया; कई दिग्गजों की प्रतिष्ठा दांव पर
कोलकाता, 23 अप्रैल (न्यूज़ डेस्क): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण का मतदान गुरुवार सुबह शुरू हो गया, जहां 152 निर्वाचन क्षेत्रों में 3.6 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि मतदान प्रक्रिया के साथ ही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर बड़ा विवाद भी चुनावी परिदृश्य पर छाया हुआ है। लगभग 27 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने के आरोपों ने इस चुनाव को केवल राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि मताधिकार के अधिकार से जुड़े मुद्दे में बदल दिया है।
चुनाव आयोग के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनमें “तार्किक विसंगतियां” पाई गई हैं। इन विसंगतियों में नाम की वर्तनी की त्रुटि, पारिवारिक विवरण में असंगति या अन्य प्रशासनिक कारण शामिल बताए गए हैं। हालांकि विपक्षी दल और कई स्थानीय संगठन इसे बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित करने का मामला बता रहे हैं।
पहले चरण में जिन 16 जिलों में मतदान हो रहा है, वहां एसआईआर प्रक्रिया के बाद मतदाता संख्या में औसतन 9.4 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। चुनाव आयोग का कहना है कि इनमें एक बड़ा हिस्सा ऐसे मतदाताओं का है जो मृत, स्थानांतरित या अनुपस्थित पाए गए। लेकिन जमीनी स्तर पर कई लोग दावा कर रहे हैं कि वैध मतदाताओं के नाम भी सूची से हटाए गए हैं।
सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में देखा गया है। मुर्शिदाबाद में करीब 7.4 लाख और मालदा में लगभग 4.5 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। मुर्शिदाबाद के शमशेरगंज क्षेत्र में स्थिति सबसे गंभीर बताई जा रही है, जहां लगभग 32 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। इस मुद्दे को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद भी तेज हो गया है, जिसके आगे भी जारी रहने की संभावना है।
राजनीतिक दिग्गजों की परीक्षा
पहले चरण में कई बड़े नेताओं का भविष्य भी दांव पर है। भाजपा के नेता सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष और कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी जैसे दिग्गजों की राजनीतिक स्थिति इस चरण के नतीजों पर निर्भर करेगी।
नंदीग्राम सीट पर सुवेंदु अधिकारी के सामने उनके पूर्व सहयोगी पबित्रा कर चुनौती बनकर उभरे हैं। 2021 में अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को यहां मामूली अंतर से हराया था। इस बार भी मुकाबला कड़ा माना जा रहा है, खासकर एसआईआर के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने के बाद।
बेहरामपुर में अधीर रंजन चौधरी के लिए यह चुनाव राजनीतिक वापसी का अवसर माना जा रहा है। पांच बार सांसद रह चुके चौधरी पिछले लोकसभा चुनाव में हार के बाद अब विधानसभा के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। यहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के साथ त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।
खड़गपुर सदर सीट पर भाजपा के दिलीप घोष भी वापसी की कोशिश में हैं। 2016 में जीत के बाद यह सीट उनके राजनीतिक करियर में महत्वपूर्ण रही है, लेकिन इस बार उन्हें तृणमूल कांग्रेस से कड़ी चुनौती मिल रही है।
हॉट सीटों पर कड़ा मुकाबला
नंदीग्राम, खड़गपुर सदर, मालतीपुर, सिलीगुड़ी और दिनहाटा जैसी सीटों पर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। नंदीग्राम में पहचान की राजनीति और जनसांख्यिकी अहम भूमिका निभा रही है। वहीं मालतीपुर में राजनीतिक परिवारों की विरासत और कल्याणकारी योजनाओं के बीच सीधी टक्कर है।
सिलीगुड़ी में अलग जिले की मांग प्रमुख मुद्दा बनकर उभरी है, जबकि दिनहाटा में सीमा, प्रवासन और भूमि विवाद चुनावी चर्चा के केंद्र में हैं। इन सीटों पर एसआईआर के कारण मतदाता संख्या में कमी ने समीकरण और जटिल बना दिए हैं।
राजनीतिक समीकरण और असर
पहले चरण में जिन जिलों में मतदान हो रहा है, उनमें से कई भाजपा के मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। पिछली विधानसभा में इन क्षेत्रों ने भाजपा को महत्वपूर्ण सीटें दिलाई थीं। इस बार पार्टी एसआईआर प्रक्रिया के बाद बदले समीकरणों के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश में है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को उम्मीद है कि मतदाताओं में नाराजगी भाजपा विरोधी वोटों में तब्दील हो सकती है। कई जगहों पर मतदान केंद्रों के बाहर मतदाताओं की नाराजगी भी देखने को मिली है, जिसका असर अंतिम नतीजों पर पड़ सकता है।
पृष्ठभूमि और विवाद
एसआईआर का उद्देश्य मूल रूप से मतदाता सूची को शुद्ध करना था, ताकि फर्जी या निष्क्रिय नाम हटाए जा सकें। लेकिन इस प्रक्रिया को लेकर पिछले कुछ वर्षों में लगातार विवाद होते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल चुनिंदा मतदाताओं को बाहर करने के लिए किया गया, जबकि चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
इस बार बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां चुनावी मुकाबला बेहद करीबी माना जा रहा है।
आगे की दिशा
पहले चरण का मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होना चुनाव आयोग के लिए चुनौती है, लेकिन एसआईआर विवाद ने इस चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब नजर 4 मई को होने वाली मतगणना पर रहेगी, जो यह तय करेगी कि बदले हुए मतदाता समीकरण किसके पक्ष में गए। साथ ही, यह भी स्पष्ट होगा कि मतदाता सूची विवाद का राजनीतिक परिणाम कितना गहरा रहा।

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