
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग तेज, राज्यसभा में विपक्ष ने नया नोटिस दिया
नौ नए आरोपों के साथ 73 सांसदों ने ‘साबित दुर्व्यवहार’ का हवाला दिया, पहले नोटिस खारिज होने के बाद फिर पहल
नई दिल्ली, 25 अप्रैल — जग वाणी न्यूज़ डेस्क: राज्यसभा में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (CEC Gyanesh Kumar) को पद से हटाने की मांग को लेकर एक बार फिर औपचारिक कदम उठाया है। शुक्रवार को 73 विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा महासचिव को नया नोटिस सौंपा, जिसमें राष्ट्रपति को संबोधित प्रस्ताव लाने की मांग की गई है। यह पहल “साबित दुर्व्यवहार” के आधार पर की गई है।
इससे पहले इसी महीने विपक्ष द्वारा लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए नोटिस को क्रमशः स्पीकर और सभापति ने खारिज कर दिया था। अब विपक्ष ने संशोधित और विस्तृत आरोपों के साथ दोबारा यह प्रक्रिया शुरू की है।
नया नोटिस और राजनीतिक बयान
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच X पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि राज्यसभा में 73 विपक्षी सांसदों ने इस प्रस्ताव के लिए नया नोटिस सौंपा है। उन्होंने दावा किया कि इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ नौ ठोस और विशिष्ट आरोप दर्ज किए गए हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
रमेश ने कहा कि “इस तरह के आरोपों के बावजूद उनका पद पर बने रहना संविधान की भावना के खिलाफ है।” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित पदाधिकारी सरकार के शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव में काम कर रहे हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद 8 अप्रैल को चुनाव आयोग और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के प्रतिनिधिमंडल के बीच हुई बैठक के बाद तेज हुआ। विपक्ष का आरोप है कि बैठक के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त का व्यवहार “अभद्र” था।
टीएमसी नेताओं ने आरोप लगाया था कि बैठक के दौरान उन्हें “दफा हो जाने” तक कहा गया, जबकि चुनाव आयोग ने पलटकर आरोप लगाया कि प्रतिनिधिमंडल ने ऊंची आवाज में बात की। इस घटना के बाद चुनाव आयोग की ओर से जारी एक “स्ट्रेट टॉक” सोशल मीडिया पोस्ट भी विवाद का कारण बना।
आरोपों का विवरण
नए नोटिस में विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं:
- आचार संहिता में पक्षपात: विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता लागू करने में असमानता दिखाई।
- प्रधानमंत्री के संबोधन पर कार्रवाई नहीं: 18 अप्रैल को महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के खिलाफ शिकायतों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
- संस्थागत पक्षपात: आरोप है कि प्रशासनिक स्तर पर सत्तारूढ़ दल के साथ निकटता दिखाई गई।
- अभद्र आचरण: टीएमसी के साथ बैठक में कथित अनुचित व्यवहार को भी आरोपों में शामिल किया गया है।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाने का मुद्दा भी उठाया गया है। विपक्ष का दावा है कि करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए और लगभग 34 लाख लोगों को मतदान अधिकार से वंचित किया गया।
अन्य आरोपों में आधिकारिक शिकायतों पर कार्रवाई में देरी, और दोषपूर्ण प्रक्रियाओं को देशभर में लागू करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
किन दलों का समर्थन
इस प्रस्ताव पर कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, सीपीआई, सीपीएम, एनसीपी (शरद पवार गुट), शिवसेना (यूबीटी), झारखंड मुक्ति मोर्चा, आईयूएमएल, नेशनल कॉन्फ्रेंस और आम आदमी पार्टी के सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। यह विपक्षी एकजुटता इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से और महत्वपूर्ण बना रही है।
प्रक्रिया और संवैधानिक पहलू
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया संविधान में निर्धारित है, जो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान कठोर मानी जाती है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है और अंततः राष्ट्रपति की मंजूरी जरूरी होती है।
इस कारण, केवल नोटिस देने से प्रक्रिया पूरी नहीं होती, बल्कि इसे आगे बढ़ाने के लिए व्यापक राजनीतिक समर्थन और कानूनी कसौटियों पर खरा उतरना जरूरी होता है।
आगे क्या
विपक्ष के इस नए नोटिस पर अब राज्यसभा सचिवालय की कार्रवाई और सभापति का निर्णय अहम होगा। यदि इसे स्वीकार किया जाता है, तो संसद में इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा संभव है, जिससे राजनीतिक माहौल और गर्म हो सकता है।
वहीं, चुनाव आयोग या संबंधित पदाधिकारी की ओर से अब तक इस नए नोटिस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

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