मनरेगा की जगह नए कानून पर कांग्रेस का बड़ा हमला

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कांग्रेस ने मनरेगा की जगह लागू होने वाले नए वीबी-जी राम जी कानून पर सवाल उठाए। जयराम रमेश ने इसे राजनीतिक प्रचार बताया।


मनरेगा की जगह नए कानून पर कांग्रेस का हमला, जयराम रमेश ने उठाए कई सवाल

‘विकसित भारत-जी राम जी कानून’ को बताया प्रचार का हथकंडा, ग्रामीण मजदूरों के अधिकार कमजोर करने का आरोप


नई दिल्ली, 12 मई (जग वाणी ब्यूरो): केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा की जगह नए “विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)” यानी वीबी-जी राम जी कानून लागू करने के ऐलान पर कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। पार्टी ने इसे ग्रामीण गरीबों के हितों से ज्यादा राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बताया है।

कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने कहा कि मोदी सरकार एक बार फिर बड़े-बड़े दावों और नई योजनाओं के नाम पर सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रही है, जबकि इस नए कानून की मूल और जरूरी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

केंद्र सरकार ने सोमवार को घोषणा की थी कि “विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण)” 1 जुलाई 2026 से पूरे देश में लागू किया जाएगा। सरकार के अनुसार यह नया कानून महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा की जगह लेगा। इसके तहत ग्रामीण परिवारों को 125 दिनों के कानूनी रोजगार की गारंटी देने का दावा किया गया है।

सरकार की घोषणा के बाद जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जो पहले से ज्ञात न हो। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल प्रचार में व्यस्त है, जबकि योजना के असली ढांचे और नियमों पर अब तक स्पष्टता नहीं है।

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह कानून 1 जुलाई से लागू होना है तो इसके प्रशासनिक और व्यावहारिक पहलुओं की जानकारी अभी तक सामने क्यों नहीं लाई गई। उनके मुताबिक, इतने बड़े बदलाव से पहले राज्य सरकारों, पंचायत संस्थाओं और आम जनता के साथ गंभीर और सार्थक चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा।

कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि नए कानून के जरिए ग्रामीण मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत कमजोर की जा रही है। उन्होंने कहा कि मनरेगा ने गांवों में रहने वाले गरीब परिवारों को काम और मजदूरी का कानूनी अधिकार दिया था, लेकिन नया कानून उस अधिकार को सीमित करने की कोशिश करता दिखाई देता है।

जयराम रमेश ने यह भी कहा कि मनरेगा केवल एक रोजगार योजना नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सुरक्षा कवच बन चुकी थी। कोरोना महामारी और आर्थिक संकट जैसे कठिन दौर में इस योजना ने करोड़ों लोगों को सहारा दिया। ऐसे में किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले पूरी पारदर्शिता जरूरी है।

कांग्रेस ने दावा किया कि सरकार ग्रामीण गरीबों की वास्तविक समस्याओं को हल करने के बजाय नई योजनाओं और नए नामों के जरिए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है। पार्टी का कहना है कि यदि सरकार सच में ग्रामीण रोजगार को मजबूत बनाना चाहती है तो उसे पहले मौजूदा व्यवस्था की कमियों को दूर करना चाहिए था।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मनरेगा पिछले कई वर्षों से देश की सबसे महत्वपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजनाओं में शामिल रही है। यह योजना विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब और मजदूर वर्ग के लिए आय का एक बड़ा सहारा रही है। इसलिए इसमें किसी भी बड़े बदलाव को राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है।

दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि नया कानून ग्रामीण रोजगार व्यवस्था को अधिक प्रभावी और आधुनिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक नई योजना में तकनीक, कौशल विकास और स्थानीय विकास परियोजनाओं पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके।

हालांकि विपक्ष लगातार इस योजना पर सवाल उठा रहा है। विपक्षी दलों का कहना है कि जब तक कानून की पूरी रूपरेखा, फंडिंग व्यवस्था, मजदूरी से जुड़े नियम और राज्यों की भूमिका स्पष्ट नहीं की जाती, तब तक इस पर भरोसा करना मुश्किल होगा।

आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर संसद और राजनीतिक गलियारों में बहस तेज होने की संभावना है। माना जा रहा है कि मनरेगा की जगह नए कानून को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और बढ़ सकता है।


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