मप्र के 39 आयुर्वेद कॉलेजों में पहली बार DM कोर्स

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मध्य प्रदेश के 39 आयुर्वेद कॉलेजों में पहली बार शुरू होंगे सुपर स्पेशियलिटी DM कोर्स


मनोचिकित्सा, हेपेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, अस्थि रोग, प्रजनन चिकित्सा और जेरोन्टोलॉजी जैसे विषय शामिल; प्रवेश के लिए MD/MS आयुर्वेद अनिवार्य

भोपाल, 23 मार्च: मध्य प्रदेश में आयुर्वेद शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव होने जा रहा है। राज्य के 39 आयुर्वेद कॉलेजों में पहली बार तीन वर्षीय सुपर स्पेशियलिटी डॉक्टर ऑफ मेडिसिन (DM) कोर्स शुरू किए जाएंगे। यह पहल आयुष मंत्रालय की नई व्यवस्था के तहत की जा रही है, जिसका उद्देश्य आयुर्वेद में उच्च स्तरीय विशेषज्ञ तैयार करना है।

राज्य में कुल 39 आयुर्वेद कॉलेज हैं। इनमें 7 सरकारी और 32 निजी संस्थान शामिल हैं। ये कॉलेज भोपाल, जबलपुर, इंदौर, बुरहानपुर, रतलाम, उज्जैन, रीवा, ग्वालियर, मंदसौर, छतरपुर, शिवपुरी, बालाघाट, देवास और सीहोर जैसे शहरों में स्थित हैं। इन संस्थानों में अब सुपर स्पेशियलिटी स्तर की पढ़ाई शुरू होने से आयुर्वेद चिकित्सा शिक्षा को नया विस्तार मिलने की उम्मीद है।

नई व्यवस्था के अनुसार, आयुर्वेद में DM कोर्स की अवधि तीन वर्ष होगी। यह कोर्स एलोपैथी में होने वाले सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों की तर्ज पर तैयार किया गया है। प्रवेश के लिए संबंधित शाखा में आयुर्वेद की स्नातकोत्तर डिग्री, यानी MD या MS, अनिवार्य होगी। इससे साफ है कि यह कोर्स केवल उन विद्यार्थियों के लिए होगा जो पहले से आयुर्वेद में विशेषज्ञता प्राप्त कर चुके हैं और अब उससे आगे बढ़कर उन्नत अध्ययन करना चाहते हैं।

इन सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में मनोचिकित्सा, हेपेटोलॉजी, ऑन्कोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स, प्रजनन चिकित्सा और जेरोन्टोलॉजी जैसे विषय शामिल किए गए हैं। इसका मतलब है कि आयुर्वेद में अब केवल सामान्य चिकित्सा या पारंपरिक उपचार तक सीमित रहने के बजाय विशिष्ट रोगों और आयु वर्गों के लिए भी अलग विशेषज्ञ तैयार किए जाएंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से आयुर्वेद में क्लिनिकल प्रैक्टिस, शोध और उन्नत सैद्धांतिक अध्ययन को बढ़ावा मिलेगा। अब तक आयुर्वेद की पढ़ाई में सुपर स्पेशियलिटी स्तर के अवसर सीमित थे, लेकिन DM कोर्स शुरू होने के बाद छात्रों के लिए विशेषज्ञता का नया रास्ता खुलेगा। इससे संस्थानों में शोध संस्कृति भी मजबूत हो सकती है और गंभीर रोगों के आयुर्वेदिक अध्ययन को नया आधार मिल सकता है।

इस संबंध में नेशनल कमीशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) ने एक परिपत्र जारी किया है। इसी के आधार पर राज्यों और संस्थानों में आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। सूत्रों के अनुसार, कॉलेजों को पहले राज्य सरकार से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी NOC लेना होगा। इसके बाद संबंधित विश्वविद्यालय में औपचारिक आवेदन देना होगा और आवश्यक सूचनाएं NCISM को भेजनी होंगी।

निजी आयुर्वेद कॉलेज शिक्षक कल्याण संघ के कार्यकारी अध्यक्ष और आयुष मेडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश पांडेय ने कहा कि यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से पूरी की जाएगी। उनके अनुसार, शुरुआती कदम के रूप में आयुर्वेद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को राज्य सरकार से NOC प्राप्त करनी होगी। इसके बाद विश्वविद्यालय के माध्यम से आवेदन और आवश्यक दस्तावेज जमा कराए जाएंगे।

प्रवेश प्रक्रिया को लेकर भी प्रतिस्पर्धी व्यवस्था की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, DM कोर्स में दाखिला ऑल इंडिया आयुष पोस्ट ग्रेजुएट एंट्रेंस टेस्ट (AIAPGET) जैसी प्रतियोगी परीक्षा के आधार पर दिया जा सकता है। हालांकि अंतिम प्रक्रिया संबंधित अधिसूचना और नियामक दिशा-निर्देशों के अनुसार तय होगी। इससे यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में योग्य और तैयार अभ्यर्थियों को ही प्रवेश मिले।

यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि देशभर में आयुष और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को लेकर नई रुचि देखी जा रही है। ऐसे समय में आयुर्वेद शिक्षा को सामान्य डिग्री से आगे बढ़ाकर सुपर स्पेशियलिटी स्तर तक ले जाना नीति स्तर पर बड़ा कदम माना जा रहा है। मध्य प्रदेश जैसे राज्य में, जहां सरकारी और निजी दोनों स्तर पर आयुर्वेद संस्थानों का बड़ा नेटवर्क मौजूद है, इस फैसले का असर व्यापक हो सकता है।

हालांकि इस पहल के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी होंगी। विशेषज्ञ फैकल्टी, क्लिनिकल प्रशिक्षण, शोध सुविधाएं, अस्पतालों की क्षमता और नियामक मानकों को पूरा करना संस्थानों के लिए जरूरी होगा। खासकर निजी कॉलेजों के लिए बुनियादी ढांचे और गुणवत्ता मानकों को बनाए रखना एक बड़ी जिम्मेदारी होगी। इसलिए आने वाले समय में यह भी देखा जाएगा कि कितने कॉलेज वास्तव में इन पाठ्यक्रमों को शुरू करने की मंजूरी प्राप्त कर पाते हैं।

फिर भी, शिक्षा जगत में इसे आयुर्वेद के लिए एक नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। यदि यह योजना व्यवस्थित ढंग से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में आयुर्वेद के भीतर कई नई विशेषज्ञ शाखाएं विकसित हो सकती हैं। इससे छात्रों को बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलेंगे, शोध को गति मिलेगी और मरीजों के लिए विशेषज्ञ आयुर्वेदिक उपचार सेवाओं का दायरा भी बढ़ सकता है।

आने वाले महीनों में राज्य सरकार, विश्वविद्यालयों और NCISM की ओर से जारी होने वाले दिशा-निर्देश इस पूरी प्रक्रिया की गति तय करेंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश आयुर्वेद शिक्षा में सुपर स्पेशियलिटी कोर्स शुरू करने वाले प्रमुख राज्यों में शामिल होने जा रहा है।


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