
सांकेतिक फ़ोटो
NSO रिपोर्ट 2025 में खुलासा, 58 लाख नए छोटे कारोबार शुरू हुए लेकिन करोड़ों स्वरोज़गारियों की आय न्यूनतम वेतन से भी कम रही।
स्वरोज़गार का सच: 58 लाख नए कारोबार, लेकिन कमाई दिहाड़ी मजदूर से भी कम
बढ़ते ‘सेल्फ–एम्प्लॉयमेंट’ के पीछे क्या छिपा है भारत का रोज़गार संकट?
भारत में अक्सर यह कहा जाता है कि “लोग नौकरी मांगने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बन रहे हैं।” सरकारें स्वरोजगार, स्टार्टअप और उद्यमिता को आर्थिक आत्मनिर्भरता की नई धुरी बताती रही हैं। लेकिन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की ताजा वार्षिक सर्वेक्षण रिपोर्ट इस चमकदार दावे के पीछे की कठोर वास्तविकता सामने रखती है।
देश में एक साल के भीतर 58 लाख नए असंगठित कारोबार शुरू हुए। पहली नजर में यह आर्थिक सक्रियता और उद्यमशीलता का संकेत लगता है। मगर जब यही रिपोर्ट बताती है कि इन कारोबारों से जुड़ा व्यक्ति औसतन 600 रुपए प्रतिदिन से भी कम आर्थिक मूल्य पैदा कर पा रहा है, और वास्तविक आमदनी इससे भी कम है, तब सवाल बदल जाता है।
क्या भारत में स्वरोजगार अवसर का प्रतीक है, या मजबूरी का दूसरा नाम बन चुका है?
पृष्ठभूमि: बढ़ते कारोबार, लेकिन किस कीमत पर?
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की “असंगठित सेक्टर के उद्यमों का वार्षिक सर्वेक्षण 2025” रिपोर्ट देश के गैर-कृषि असंगठित क्षेत्र की सबसे व्यापक तस्वीर पेश करती है। लगभग 6.7 लाख प्रतिष्ठानों के सर्वेक्षण पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि:
- देश में असंगठित गैर-कृषि कारोबारों की संख्या बढ़कर 7.92 करोड़ हो गई।
- एक साल में लगभग 58 लाख नए कारोबार जुड़े।
- इस क्षेत्र में करीब 75 लाख नए रोजगार पैदा हुए।
- कुल रोजगार अब 12.81 करोड़ तक पहुंच गया।
पहली नजर में यह आंकड़े सकारात्मक लगते हैं। लेकिन इनके भीतर एक बड़ा आर्थिक संकेत छिपा है — भारत का रोजगार ढांचा औपचारिक नौकरियों की बजाय छोटे, कम उत्पादक और असुरक्षित कामों की ओर खिसक रहा है।
यह वही अर्थव्यवस्था है जहां बड़ी संख्या में लोग छोटी दुकानों, मोबाइल रिपेयर, दर्जीगिरी, घरेलू उत्पादन, सड़क किनारे व्यापार, ऑनलाइन रीसेलिंग, स्थानीय सेवा और पारिवारिक कारोबारों के सहारे जीवन चला रहे हैं।
विश्लेषण: रोज़गार बढ़ा, लेकिन आय क्यों नहीं?
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा आय और उत्पादकता से जुड़ा है।
प्रति प्रतिष्ठान औसत सकल मूल्य संवर्धन (GVA) सिर्फ 2.5 लाख रुपए सालाना है। यानी:
- लगभग 20,800 रुपए प्रतिमाह
- करीब 685 रुपए प्रतिदिन
और यह “आय” भी नहीं है। इसमें किराया, बिजली, कच्चा माल, परिवहन और दूसरे खर्च शामिल हैं। वास्तविक बचत इससे काफी कम होती है।
प्रति कामगार औसत GVA 1.6 लाख रुपए सालाना है — यानी लगभग 440 रुपए प्रतिदिन।
यह कई राज्यों के न्यूनतम वेतन से भी कम स्तर है।
यानी भारत में करोड़ों लोग “रोजगार” में तो हैं, लेकिन उनकी आय सम्मानजनक जीवन के लिए पर्याप्त नहीं है।
‘जॉबलेस ग्रोथ’ का दूसरा चेहरा
पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में एक विरोधाभास लगातार दिखा है:
- GDP बढ़ रही है,
- शेयर बाजार रिकॉर्ड बना रहा है,
- कॉर्पोरेट मुनाफे बढ़ रहे हैं,
लेकिन स्थायी और उच्च वेतन वाली नौकरियां उसी गति से नहीं बढ़ रहीं।
ऐसे में बड़ी संख्या में लोग स्वरोजगार की ओर धकेले जा रहे हैं। यह स्वैच्छिक उद्यमिता कम और “सर्वाइवल इकॉनमी” ज्यादा दिखाई देती है।
किसी छोटे कस्बे में चाय की दुकान खोलना, ई-रिक्शा चलाना, घर से सिलाई करना या मोबाइल कवर बेचना — ये सब आर्थिक गतिविधियां जरूर हैं, लेकिन इनमें सामाजिक सुरक्षा, आय स्थिरता और भविष्य की सुरक्षा लगभग नहीं है।
यही वजह है कि भारत में बेरोजगारी का संकट कई बार “कम आय वाले स्वरोजगार” के भीतर छिप जाता है।
कर्ज का जाल और सीमित पूंजी
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि हर प्रतिष्ठान पर औसतन 42,776 रुपए का कर्ज है।
यह राशि बहुत बड़ी नहीं लगती, लेकिन छोटे कारोबारों के लिए यही पूंजी जीवनरेखा होती है। समस्या यह है कि:
- कर्ज सीमित है,
- निवेश क्षमता कम है,
- तकनीकी उन्नयन लगभग नहीं हो पाता,
- कारोबार विस्तार की संभावना सीमित रहती है।
यानी लाखों छोटे उद्यम “लो-प्रोडक्टिविटी ट्रैप” में फंसे हुए हैं — जहां वे न तो बंद हो पा रहे हैं, न ही बड़े बन पा रहे हैं।
भारत में सूक्ष्म उद्यमों का बड़ा हिस्सा अभी भी:
- डिजिटल तकनीक से दूर है,
- औपचारिक बाजार तक नहीं पहुंच पाता,
- ब्रांडिंग और स्केलिंग नहीं कर पाता,
- और स्थानीय मांग पर निर्भर रहता है।
क्या सरकार की नीतियां पर्याप्त हैं?
सरकार मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल भुगतान और PM SVANidhi जैसी योजनाओं को स्वरोजगार प्रोत्साहन के उदाहरण के रूप में पेश करती है। इन योजनाओं का असर भी पड़ा है — खासकर वित्तीय पहुंच और डिजिटल लेनदेन में।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या केवल “छोटा कारोबार शुरू कर देना” आर्थिक सशक्तिकरण माना जा सकता है?
यदि करोड़ों लोग:
- न्यूनतम वेतन से कम कमा रहे हों,
- सामाजिक सुरक्षा से बाहर हों,
- पेंशन, बीमा या स्वास्थ्य सुरक्षा न रखते हों,
- और लगातार अस्थिर आय पर निर्भर हों,
तो केवल उद्यमिता के आंकड़े आर्थिक सफलता का प्रमाण नहीं बन सकते।
प्रतिवाद: क्या असंगठित क्षेत्र को कमतर आंकना सही है?
इस बहस का दूसरा पक्ष भी है।
भारत जैसे विशाल और विविध देश में असंगठित क्षेत्र हमेशा रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत रहा है। यही क्षेत्र:
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चलाता है,
- कम पूंजी में काम देता है,
- आर्थिक संकट के दौरान सुरक्षा कवच बनता है।
कोविड के बाद लाखों लोगों ने इसी क्षेत्र के जरिए आजीविका दोबारा शुरू की।
इसके अलावा, हर छोटा कारोबार स्थायी रूप से छोटा ही रहे, यह भी जरूरी नहीं। कई बड़े व्यवसाय भी छोटे स्तर से शुरू हुए थे।
समस्या इसलिए स्वरोजगार नहीं है। समस्या यह है कि अधिकांश स्वरोजगार “उच्च उत्पादकता” में बदल नहीं पा रहा।
असली मुद्दा: रोजगार की गुणवत्ता
भारत की बहस अब सिर्फ “कितने रोजगार” पर नहीं रह सकती। असली सवाल “कैसे रोजगार” का है।
यदि रोजगार:
- कम आय वाला हो,
- असुरक्षित हो,
- कौशल विकास से जुड़ा न हो,
- और सामाजिक गतिशीलता न दे,
तो वह आर्थिक प्रगति की मजबूत नींव नहीं बन सकता।
भारत के सामने चुनौती दोहरी है:
- रोजगार पैदा करना,
- और उन रोजगारों को उत्पादक व सम्मानजनक बनाना।
इसके लिए केवल लोन देना पर्याप्त नहीं होगा।
ज़रूरत है:
- कौशल उन्नयन,
- स्थानीय उद्योग क्लस्टर,
- तकनीकी सहायता,
- सस्ती पूंजी,
- सामाजिक सुरक्षा,
- और छोटे कारोबारों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की।
उद्यमिता और मजबूरी के बीच फंसा भारत
58 लाख नए कारोबारों का आंकड़ा सुनने में उत्साहजनक लगता है। लेकिन जब उसी तस्वीर में कम आय, कमजोर उत्पादकता और असुरक्षित जीवन दिखाई देता है, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि भारत का स्वरोजगार मॉडल अभी अधूरा है।
देश में लोग काम करना चाहते हैं। लोग जोखिम उठा रहे हैं। लोग छोटे कारोबार शुरू कर रहे हैं।
लेकिन यदि इतनी मेहनत के बाद भी आमदनी न्यूनतम वेतन से नीचे रहे, तो यह केवल उद्यमिता की कहानी नहीं, बल्कि रोजगार संरचना की गहरी कमजोरी की कहानी भी है।
भारत आज “स्टार्टअप नेशन” और “सर्वाइवल इकॉनमी” — दोनों के बीच खड़ा है।
सवाल यही है कि आने वाले वर्षों में नीति किस भारत को मजबूत करेगी।
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ग़ज़नफ़र एक प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, शोधकर्ता और मीडिया सलाहकार हैं। उनके पास पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है और उन्होंने विभिन्न मीडिया आउटलेट्स के साथ काम किया है। ग़ज़नफ़र की लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और सूचनात्मक है, जो उन्हें पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाती है। ग़ज़नफ़र की रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता उनके लेखन और शोध में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे विभिन्न विषयों पर लिखते हैं और विभिन्न संगठनों को मीडिया से सम्बंधित विषयों पर परामर्श प्रदान करते हैं।
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