Tag: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़

डोनाल्ड ट्रंप बोले- ईरान अब भी समझौते को तैयार
अमेरिका, ईरान

डोनाल्ड ट्रंप बोले- ईरान अब भी समझौते को तैयार

अमेरिका-ईरान युद्धविराम के 33 दिन बाद भी तनाव कायम। ट्रंप ने कहा- ईरान समझौते में दिलचस्पी रखता है, रूस ने जताई चिंता। ट्रंप बोले- ईरान अब भी समझौते में दिलचस्पी रखता है, युद्धविराम के बाद भी कायम है तनाव 33 दिन बाद भी अमेरिका-ईरान के बीच अविश्वास बरकरार, रूस ने भी जताई चिंता तेहरान/वॉशिंगटन, 11 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्धविराम को 33 दिन बीत चुके हैं, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों में अब भी अविश्वास और अनिश्चितता का माहौल बना हुआ है। एक ओर अमेरिका शांति वार्ता और संघर्ष खत्म करने के लिए ईरान के जवाब का इंतजार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि वह युद्धविराम पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक फ्रांसीसी मीडिया संस्थान को दिए फोन इंटरव्यू में कहा कि तेहरान अब भी किसी समझौते तक पहुंचने में रुचि र...
ईरान रेस्क्यू ऑपरेशन: सैन्य सफलता या रणनीतिक संकट?
ईरान, विश्लेषण, संपादकीय

ईरान रेस्क्यू ऑपरेशन: सैन्य सफलता या रणनीतिक संकट?

ईरान में अमेरिकी रेस्क्यू ऑपरेशन: सैन्य सफ़लता या गहराता रणनीतिक संकट? एक सैनिक को बचाने की कहानी ने उजागर किए युद्ध, कूटनीति और वैश्विक संतुलन के बड़े सवाल ईरान के पहाड़ी इलाके में फंसे एक अमेरिकी एयरफोर्स अधिकारी को बचाने का हालिया ऑपरेशन सतह पर एक असाधारण सैन्य सफ़लता की कहानी लगता है। लेकिन यदि इसे व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह घटना केवल एक रेस्क्यू मिशन नहीं, बल्कि अमेरिका-ईरान टकराव के ख़तरनाक विस्तार, सैन्य प्राथमिकताओं और कूटनीतिक विफलताओं का संकेत भी देती है। मूल मुद्दा: एक सैनिक, कई संदेश जब अमेरिकी F-15E लड़ाकू विमान ईरानी हमले में गिरा और उसका एक अधिकारी दुश्मन इलाके में फंस गया, तब अमेरिकी सैन्य तंत्र ने अपनी पूरी ताकत उस एक व्यक्ति को बचाने में झोंक दी। यह निर्णय अमेरिकी सैन्य सिद्धांत “नो मैन लेफ्ट बिहाइंड” के अनुरूप था। लेकिन सवाल यह है कि क्या एक सैन...
होर्मुज़ पर तनाव: दक्षिण एशिया अब तमाशबीन नहीं रह सकता
विश्लेषण, संपादकीय

होर्मुज़ पर तनाव: दक्षिण एशिया अब तमाशबीन नहीं रह सकता

होर्मुज़ पर तनाव: दक्षिण एशिया अब चुप नहीं रह सकता अगर होर्मुज़ में संकट गहराता है, तो उसका असर केवल खाड़ी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। तेल, व्यापार, महँगाई और आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर इसका सीधा असर दक्षिण एशिया को भी झेलना पड़ेगा। ऐसे समय में ग्लोबल साउथ की कूटनीति कोई आदर्शवादी बात नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक ज़रूरत है। पश्चिम एशिया का युद्ध अगर समुद्र तक पहुँचा, तो उसकी लहरें दक्षिण एशिया की जेब तक आएँगी। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब केवल उस क्षेत्र की सीमाओं में बंद संकट नहीं रह गया है। अगर हालात और बिगड़ते हैं और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ तक अस्थिरता फैलती है, तो उसका असर सीधे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और आम लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ेगा। तेल के दाम, व्यापारिक आवाजाही, शिपिंग लागत और महँगाई — सब इस संकट से प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे...