US ने 20 साल के न्यूक्लियर फ़्रीज़ का प्रस्ताव रखा, ईरान ने ख़ारिज कर दिया

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डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 20 साल की रोक की बात कही, जबकि ईरान ने दावा किया कि यह अमेरिकी प्रस्ताव था जिसे उसने खारिज कर दिया।


ट्रंप का दावा बनाम ईरान की हकीकत: 20 साल परमाणु कार्यक्रम रोकने का प्रस्ताव किसका था?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 20 साल की रोक से “कोई आपत्ति नहीं”, जबकि ईरान समर्थित रिपोर्टों में दावा किया गया है कि यह प्रस्ताव खुद अमेरिका की ओर से आया था और तेहरान ने इसे खारिज कर दिया।


तेहरान, 15 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने शुक्रवार को दावा किया कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को 20 वर्षों के लिए निलंबित करता है, तो उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं होगी। हालांकि ईरानी मीडिया और क्षेत्रीय सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव वास्तव में अमेरिका की ओर से रखा गया था, जिसे तेहरान ने स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया है।

ईरान की समाचार एजेंसी Tasnim News Agency की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप ने चीन से वॉशिंगटन लौटते समय एयर फ़ोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि ईरान को “वास्तविक प्रतिबद्धता” के साथ अपना परमाणु कार्यक्रम 20 वर्षों के लिए रोकना होगा।

लेकिन ईरानी पक्ष का कहना है कि ट्रंप ने अपने बयान को इस तरह पेश किया, मानो यह प्रस्ताव ईरान या किसी तीसरे पक्ष की ओर से आया हो और अब अमेरिका उसे स्वीकार करने को तैयार हो। जबकि वास्तविक स्थिति इसके विपरीत बताई जा रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, 20 साल तक परमाणु गतिविधियां रोकने का विचार अमेरिकी पक्ष से सामने रखा गया था। ईरान ने न केवल इसे ठुकरा दिया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में वह परमाणु मुद्दे पर किसी प्रकार की चर्चा के लिए तैयार नहीं है।

ईरान का कहना है कि उसने पाकिस्तानी मध्यस्थ के माध्यम से जो दस्तावेज और संदेश भेजे हैं, वे केवल युद्ध समाप्त करने और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर केंद्रित हैं। तेहरान के अनुसार, जब तक क्षेत्र में संघर्ष समाप्त नहीं होता, तब तक परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत संभव नहीं है।

ईरानी सूत्रों ने कई शर्तें भी सामने रखी हैं, जिनके बिना किसी प्रकार की वार्ता आगे नहीं बढ़ेगी। इनमें अमेरिका द्वारा ईरान की जमी हुई संपत्तियों को मुक्त करना, सभी प्रतिबंध पूरी तरह हटाने की गारंटी देना, होरमुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान की संप्रभुता को स्वीकार करना, समुद्री नाकेबंदी समाप्त करना, युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई करना और ईरान के आसपास मौजूद अमेरिकी सैन्य बलों की वापसी जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं।

परमाणु विवाद फिर चर्चा में

ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव कोई नया विषय नहीं है। 2015 में दोनों देशों सहित विश्व शक्तियों के बीच परमाणु समझौता हुआ था, जिसे आम तौर पर JCPOA कहा जाता है। लेकिन बाद में ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए।

इसके बाद से दोनों देशों के बीच अविश्वास लगातार बढ़ा है। ईरान कई बार कह चुका है कि वह अपने परमाणु कार्यक्रम को “शांतिपूर्ण उद्देश्य” के लिए चला रहा है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों को आशंका है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित करने की क्षमता हासिल करना चाहता है।

क्षेत्रीय तनाव और नई कूटनीतिक जंग

हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, विशेष रूप से गाज़ा और लेबनान की स्थिति के बाद, ईरान और अमेरिका के बीच बयानबाज़ी और तेज हुई है। ईरान का दावा है कि जब तक क्षेत्र में “युद्ध जैसी स्थिति” समाप्त नहीं होती, तब तक वह किसी भी रणनीतिक समझौते की दिशा में कदम नहीं बढ़ाएगा।

विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का बयान अमेरिकी चुनावी राजनीति और पश्चिम एशिया नीति दोनों से जुड़ा हो सकता है। वहीं ईरान इस मुद्दे को अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है।

फिलहाल दोनों देशों के बीच किसी औपचारिक समझौते या नई वार्ता की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन ट्रंप के बयान और ईरानी प्रतिक्रिया ने एक बार फिर परमाणु विवाद को अंतरराष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।


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