
इलाहाबाद हाईकोर्ट की एनएचआरसी पर सख्त टिप्पणी, मदरसों की जांच पर उठे गंभीर सवाल
कोर्ट ने आयोग की प्राथमिकताओं पर जताई चिंता, 588 मदरसों की ईओडब्ल्यू जांच पर अंतरिम रोक; अगली सुनवाई 11 मई को
प्रयागराज, 1 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): Allahabad High Court ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए उत्तर प्रदेश के मदरसों की जांच के आदेश पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने प्रथम दृष्ट्या इसे गैरकानूनी बताते हुए आर्थिक अपराध शाखा (EOW) से कराई जा रही जांच पर फिलहाल रोक लगा दी है। इस मामले ने न्यायपालिका और मानवाधिकार संस्थाओं की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस Atul Sreedharan और जस्टिस Vivek Saran की डिवीजन बेंच ने आयोग की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए।
जस्टिस श्रीधरन ने अपने आदेश में कहा कि जब समाज में मॉब लिंचिंग जैसी गंभीर घटनाएं सामने आती हैं, तब आयोग की सक्रियता नजर नहीं आती, जबकि मदरसों की जांच के मामले में सख्त रुख अपनाया गया है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आयोग को अपने मूल कर्तव्यों पर ध्यान देना चाहिए, न कि ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए जो उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़े करते हैं।
मदरसों की जांच पर रोक
मामले में National Human Rights Commission (NHRC) के निर्देश पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 588 अनुदानित मदरसों की जांच आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को सौंपी थी।
हाईकोर्ट ने इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए फिलहाल इस जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह याचिका टीचर्स एसोसिएशन मदारिस अरबिया और अन्य पक्षों द्वारा दाखिल की गई थी।
बेंच में मतभेद भी सामने आए
इस मामले में सुनवाई कर रही डिवीजन बेंच के दोनों जजों के बीच मतभेद भी सामने आए।
जस्टिस Vivek Saran ने जस्टिस श्रीधरन की कुछ टिप्पणियों से असहमति जताई और अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वह उन पैराग्राफ से खुद को अलग करते हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मतभेद के कारण मामला आगे बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) को भेजा जा सकता है।
NHRC का पक्ष
इस पूरे घटनाक्रम पर National Human Rights Commission ने कहा है कि वह प्राप्त शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करता है।
आयोग के सदस्य Priyank Kanoongo ने कहा कि अंतिम निष्कर्ष जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगा। उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल जांच पर रोक है और पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए प्रक्रिया को पूरा होना जरूरी है।
कानूनी और संवैधानिक पहलू
यह मामला केवल मदरसों की जांच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि मानवाधिकार आयोग की भूमिका और अधिकार-सीमा क्या होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आयोग अपनी परिभाषित सीमा से बाहर जाकर कार्रवाई करता है, तो यह संवैधानिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। वहीं, आयोग का तर्क है कि शिकायत मिलने पर जांच करना उसकी जिम्मेदारी है।
आगे की सुनवाई और संभावित असर
Allahabad High Court ने NHRC को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 11 मई को निर्धारित की गई है।
यदि मामला बड़ी पीठ को सौंपा जाता है, तो यह एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है, जो भविष्य में आयोगों और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करेगा।
निष्कर्ष
फिलहाल, मदरसों की जांच पर रोक और अदालत की सख्त टिप्पणी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है। आने वाले दिनों में अदालत की सुनवाई और संभावित जांच रिपोर्ट इस विवाद की दिशा तय करेगी।

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