कर्नाटक में खानाबदोश अनुसूचित जातियों के लिए अलग सर्वेक्षण की मांग

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शिवमोग्गा: कर्नाटक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति खानाबदोश एवं अर्ध-खानाबदोश विकास निगम की अध्यक्ष जी. पल्लवी ने राज्य की खानाबदोश और अर्ध-खानाबदोश अनुसूचित जाति (एससी) समुदायों के लिए अलग से सर्वेक्षण कराने की मांग की है। उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायमूर्ति नागमोहन दास आयोग द्वारा चलाए जा रहे एससी समुदायों के मैपिंग अभ्यास में इन समुदायों के सामाजिक-आर्थिक और शैक्षणिक स्तर का सही आकलन नहीं हो पाएगा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठाई गई मुख्य बातें:

गुरुवार को शिवमोग्गा में आयोजित एक प्रेस वार्ता में पल्लवी ने कहा, “आयोग द्वारा तैयार किया गया प्रश्नावली इन खानाबदोश समुदायों की विशिष्ट जरूरतों और पहचान के मापदंडों को शामिल नहीं करता। इन्हें न्याय दिलाने के लिए होबली स्तर पर तीन दिनों का अलग सर्वेक्षण होना चाहिए।” उन्होंने बताया कि 51 जातियों में फैले इन समुदायों के अधिकांश लोग अस्थायी झोपड़ियों में रहते हैं और रोजी-रोटी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान भटकते रहते हैं।

दस्तावेजों का अभाव: चुनौती

पल्लवी ने चिंता जताई कि इन समुदायों के पास जाति प्रमाणपत्र, आधार कार्ड या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज नहीं हैं, जो सर्वेक्षण के लिए जरूरी हैं। “गणक (एन्यूमरेटर) दस्तावेजों के बिना इन्हें सर्वे में शामिल नहीं कर सकते। इसलिए, एक अलग प्रक्रिया अपनाई जाए जो इनकी संस्कृति, पेशा, जीवनशैली और अन्य विवरणों को ध्यान में रखे,” उन्होंने कहा।

सरकारी योजनाओं से वंचित

उन्होंने बताया कि अशिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण ये समुदाय सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे। “सर्वेक्षण में छूट जाने पर ये फिर से पिछड़ जाएंगे। इनकी शिक्षा, रोजगार और आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सटीक डेटा जरूरी है,” पल्लवी ने जोड़ा।

आगे की राह

पल्लवी की मांग राज्य सरकार पर इन समुदायों के उत्थान के लिए विशेष नीतियां बनाने का दबाव डालती है। उन्होंने सुझाव दिया कि सर्वेक्षण टीमों को इनकी गतिशील जीवनशैली के अनुरूप प्रशिक्षित किया जाए ताकि कोई भी परिवार छूटने न पाए। इस मुद्दे पर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी पल्लवी का समर्थन किया है और सरकार से त्वरित कार्रवाई की अपील की है।

यह मांग समावेशी विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर सरकार अलग सर्वेक्षण को मंजूरी देती है, तो दशकों से उपेक्षित इन समुदायों को मुख्यधारा में लाने का रास्ता खुल सकता है।


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