
नई दिल्ली, 8 मई (KNN) – ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक हालिया रिपोर्ट ने भारत को यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ हाल ही में सम्पन्न फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के सरकारी खरीद (Government Procurement – GP) अध्याय को लागू करने में अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है।
रिपोर्ट में विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए संभावित खतरों की ओर इशारा किया गया है, जो अब विदेशी कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सामना करेंगे।
भारत का सरकारी खरीद बाजार सालाना लगभग 600 अरब अमेरिकी डॉलर का है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का करीब 15 प्रतिशत है। यह सार्वजनिक खर्च बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन, बिजली और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सहयोग प्रदान करता है। इसके साथ ही, यह नीति उपकरण के रूप में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों को बढ़ावा देने में भी सहायक है।
भारत ने अब तक विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सरकारी खरीद समझौते (GPA) से दूरी बनाए रखी है, जिससे वह घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता देने की नीति लचीलापन बनाए रख सका। मौजूदा नियमों के तहत भारत में 25% सरकारी खरीद MSMEs के लिए आरक्षित है, जिसमें महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति के स्वामित्व वाले उद्यमों को विशेष कोटा भी प्राप्त है।
हालांकि, अब भारत पर ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे व्यापार भागीदारों से अपने सरकारी खरीद बाजार को उदार बनाने का दबाव बढ़ रहा है। इसके चलते भारत-यूके एफटीए में एक व्यापक सरकारी खरीद अध्याय शामिल किया गया है, जिसके तहत ब्रिटिश कंपनियों को केंद्र सरकार की निविदाओं में भाग लेने की अनुमति दी गई है।
इस समझौते के अनुसार, केवल 20% ब्रिटिश सामग्री वाली कंपनियों को ‘क्लास 2 लोकल सप्लायर’ का दर्जा मिल सकता है—जो पहले केवल भारतीय कंपनियों के लिए आरक्षित था।
GTRI का कहना है कि इस प्रकार की छूट भारतीय MSMEs को हाशिये पर ला सकती है, जो सरकारी खरीद के संरक्षित अवसरों पर निर्भर हैं। साथ ही, इससे भारत की घरेलू उत्पादन, नवाचार और रोजगार को बढ़ावा देने वाली औद्योगिक नीति भी कमजोर हो सकती है।
GTRI ने सिफारिश की है कि भारत को रक्षा, रेलवे और बुनियादी ढांचे जैसे रणनीतिक क्षेत्रों को इस तरह की विदेशी पहुंच से बाहर रखना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय हितों की रक्षा हो सके और घरेलू उद्योगों को मजबूती मिल सके। Source link

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