
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण पर विवाद: सरकार ने हाईकोर्ट में कहा—2014 का अध्यादेश समाप्त, कोई मौजूदा कोटा नहीं
फरवरी 2026 के सरकारी आदेश को चुनौती; 4 मई को सुनवाई, राज्य ने भेदभाव के आरोपों को बताया निराधार
मुंबई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया है कि 2014 में मुस्लिमों को दिया गया 5 प्रतिशत आरक्षण उसी वर्ष समाप्त हो गया था। इसलिए फरवरी 2026 में जारी सरकारी आदेश (GR) किसी मौजूदा आरक्षण को खत्म नहीं करता। इस मामले की अगली सुनवाई 4 मई को होगी।
राज्य सरकार ने अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि जुलाई 2014 में लाया गया अध्यादेश, जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण दिया गया था, दिसंबर 2014 में स्वतः समाप्त हो गया था। सरकार के अनुसार, इस अध्यादेश की जगह कोई नया वैध कानून नहीं लाया गया, इसलिए इसके आधार पर कोई कानूनी अधिकार अब लागू नहीं माना जा सकता।
यह हलफनामा उस याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है, जिसे अधिवक्ता सैयद एजाज नकवी ने दायर किया है। उन्होंने 17 फरवरी 2026 के सरकारी आदेश को चुनौती देते हुए आरोप लगाया है कि यह आदेश मुस्लिम समुदाय के आरक्षण लाभ को समाप्त करने के समान है।
हालांकि, राज्य के सामाजिक न्याय और विशेष सहायता विभाग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि इसमें किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है और न ही संविधान का उल्लंघन हुआ है। विभाग ने कहा कि बिना विधिक आधार के कोई भी आरक्षण जारी नहीं रह सकता।
अदालत में क्या कहा गया
सरकार ने अदालत को बताया कि संविधान केवल धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। इसलिए फरवरी में जारी किया गया सरकारी आदेश पूरी तरह कानूनी प्रावधानों के अनुरूप है। साथ ही, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून बनाना विधायिका का अधिकार है और अदालत किसी अध्यादेश को दोबारा लागू करने या नया कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती।
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आर. आई. चागला और न्यायमूर्ति अद्वैत सेठना की खंडपीठ द्वारा की जानी है।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता सैयद एजाज नकवी का कहना है कि 2014 में तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत और मुस्लिम समुदाय को 5 प्रतिशत आरक्षण दिया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अदालत ने भले ही मुस्लिमों के लिए नौकरी में आरक्षण को निरस्त कर दिया था, लेकिन शिक्षा में 5 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दी थी।
नकवी के अनुसार, नया सरकारी आदेश पहले के सभी निर्णयों और परिपत्रों को समाप्त करता है, जो मुस्लिमों को विशेष पिछड़ा वर्ग (Special Backward Category-A) के तहत आरक्षण से जोड़ते थे।
क्या बदला फरवरी 2026 के आदेश में
फरवरी में जारी नए सरकारी आदेश के तहत:
- मुस्लिमों को Special Backward Category (A) के तहत मिलने वाले लाभ समाप्त कर दिए गए
- इस श्रेणी के तहत जाति प्रमाणपत्र और नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र जारी करना बंद कर दिया गया
- पहले की आरक्षण नीति से जुड़े प्रशासनिक ढांचे को खत्म कर दिया गया
सरकार का कहना है कि यह कदम केवल कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के लिए उठाया गया है, न कि किसी मौजूदा अधिकार को खत्म करने के लिए।
पृष्ठभूमि और विवाद
महाराष्ट्र में मुस्लिम आरक्षण का मुद्दा लंबे समय से विवादित रहा है।
- 2014: राज्य सरकार ने मराठा और मुस्लिम आरक्षण लागू किया
- 2014 (बाद में): अदालत ने मुस्लिमों के नौकरी आरक्षण पर रोक लगाई
- शिक्षा में सीमित आरक्षण को कुछ समय के लिए अनुमति मिली
- अध्यादेश समाप्त होने के बाद कोई नया कानून नहीं लाया गया
इस कारण आरक्षण की वैधता और उसकी निरंतरता को लेकर लगातार कानूनी सवाल उठते रहे हैं।
आगे क्या?
अब इस मामले में 4 मई को सुनवाई होगी, जिसमें अदालत यह तय करेगी कि फरवरी 2026 का सरकारी आदेश वैध है या नहीं। यह फैसला राज्य में आरक्षण नीति और विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय से जुड़े सामाजिक-राजनीतिक विमर्श पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

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