
स्क्रीन की गिरफ़्त में बचपन: एक उभरता हुआ सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट
भारत सरकार ने डिजिटल क्रांति को जन-जन तक पहुँचाया है। स्मार्टफोन और इंटरनेट ने शिक्षा, संचार और अवसरों के नए द्वार खोले हैं। परन्तु इसी प्रगति के बीच एक गंभीर और अक्सर अनदेखा संकट भी तेजी से आकार ले रहा है—बच्चों और किशोरों में स्क्रीन पर निर्भरता, जो अब केवल आदत नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है।
हाल ही में संसद में उठी चिंता इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करती है। दावा किया गया कि अत्यधिक स्क्रीन समय से जुड़ी मानसिक और व्यवहारिक समस्याएँ हर वर्ष हज़ारों बच्चों को आत्मघाती प्रवृत्तियों की ओर धकेल रही हैं। भले ही आँकड़ों पर विस्तृत सत्यापन आवश्यक हो, परन्तु यह निर्विवाद है कि डिजिटल लत (Digital Addiction) अब वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त समस्या है।
‘डोपामाइन अर्थव्यवस्था’ को समस्या की जड़ बताया जाता है।
आज के डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल सूचना देने के माध्यम नहीं हैं; वे Users के ध्यान को अधिकतम समय तक बाँधकर रखने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। Algorithm-operated सोशल मीडिया, शॉर्ट वीडियो और गेमिंग एप्स एक ऐसी ‘डोपामिन अर्थव्यवस्था’ का निर्माण करते हैं, जहाँ हर स्क्रॉल, हर नोटिफिकेशन Brain में Instant gratification पैदा करता है। बच्चों का विकसित होता मस्तिष्क इस चक्र के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, जिससे निर्भरता तेज़ी से बढ़ती है।
WHO और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन time का सीधा संबंध निम्नलिखित समस्याओं से जुड़ता है:
- नींद में बाधा और अनिद्रा
- चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) में वृद्धिध्यान
- केंद्रित करने की क्षमता में कमी
विशेष रूप से किशोरावस्था में, जब पहचान और भावनात्मक संतुलन विकसित हो रहा होता है, डिजिटल निर्भरता इन प्रक्रियाओं को बाधित कर सकती है।
दुनिया के कई देशों ने इस चुनौती को गंभीरता से लिया है। यूरोप, एशिया और अमेरिका के अनेक हिस्सों में स्कूलों में मोबाइल फ़ोन के उपयोग पर प्रतिबंध या सख़्त नियंत्रण लागू किए गए हैं। फ्रांस, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने स्क्रीन टाइम को सीमित करने और डिजिटल डिटॉक्स को बढ़ावा देने के लिए ठोस नीतियाँ अपनाई हैं।
भारत में भी इस दिशा में प्रारंभिक कदम उठे हैं, परन्तु अभी एक समन्वित राष्ट्रीय नीति का अभाव स्पष्ट दिखता है।
यह समस्या केवल सरकार या स्कूलों की नहीं, बल्कि समाज के हर स्तर की साझी ज़िम्मेदारी है। समाधान Multidimensional होना चाहिए:
1. नीति स्तर पर हस्तक्षेप
सरकार को बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम के मानक तय करने, Edtech और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए Guidelines बनाने और डिजिटल वेलबीइंग को शिक्षा नीति में शामिल करने की ज़रूरत है।
2. स्कूलों की भूमिका
स्कूलों को केवल तकनीक के उपयोग पर नहीं, बल्कि उसके संतुलित उपयोग की शिक्षा देने पर ज़ोर देना चाहिए। ‘डिजिटल साक्षरता’ (Digital Literacy) को Syllabus का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
3. अभिभावकों की ज़िम्मेदारी
घर वह पहला स्थान है जहाँ आदतें बनती हैं। अभिभावकों को ‘स्क्रीन टाइम’ के स्पष्ट नियम तय करने, बच्चों के साथ Quality टाइम बिताने और स्वयं भी Balanced डिजिटल Behaviour का उदाहरण प्रस्तुत करने की ज़रूरत है।
4. वैकल्पिक गतिविधियों का विस्तार
खेल, कला, पठन और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देना आवश्यक है, ताकि बच्चों को डिजिटल दुनिया के बाहर भी संतुष्टि और पहचान मिल सके।
तकनीक को दोष देना आसान है, परन्तु वास्तविक चुनौती उसके संतुलित उपयोग में है। डिजिटल युग से पीछे लौटना संभव नहीं, और न ही इसकी ज़रूरत है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों को तकनीक का ‘User’ बनाएं, ‘उपयोग का शिकार’ नहीं।
यदि समय रहते इस दिशा में ठोस क़दम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल तकनीकी रूप से सक्षम ही नहीं, बल्कि मानसिक रूप से अधिक अस्थिर भी हो सकती हैं। यह केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि समाज के भविष्य का भी सवाल है।

ग़ज़नफ़र एक प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, शोधकर्ता और मीडिया सलाहकार हैं। उनके पास पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है और उन्होंने विभिन्न मीडिया आउटलेट्स के साथ काम किया है। ग़ज़नफ़र की लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और सूचनात्मक है, जो उन्हें पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाती है। ग़ज़नफ़र की रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता उनके लेखन और शोध में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे विभिन्न विषयों पर लिखते हैं और विभिन्न संगठनों को मीडिया से सम्बंधित विषयों पर परामर्श प्रदान करते हैं।
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