
राम मंदिर सामूहिक प्रयास का परिणाम, भारत पहले से ही ‘हिंदू राष्ट्र’: मोहन भागवत
संघ प्रमुख का बयान—औपचारिक घोषणा की जरूरत नहीं, राष्ट्रीय पुनर्जागरण से जोड़ा संदेश
नागपुर, 28 अप्रैल — (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को कहा कि अयोध्या में बना राम मंदिर देश के सामूहिक प्रयास और प्रतिबद्ध नेतृत्व का परिणाम है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत को “हिंदू राष्ट्र” घोषित करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही एक वास्तविकता है। यह समाचार आज प्रकाशित Free Press Journal की रिपोर्ट पर आधारित है।
प्रमुख कार्यक्रम में दिया बयान
नागपुर के रेशिमबाग में आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने यह टिप्पणी की। कार्यक्रम का आयोजन Dr Hedgewar Smarak Samiti द्वारा किया गया था, जिसमें उन लोगों को सम्मानित किया गया जिनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ।
भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि मंदिर का निर्माण केवल किसी एक संस्था या सरकार के कारण नहीं, बल्कि पूरे देश के सहयोग से हुआ। उन्होंने इसे “भगवान राम की इच्छा” बताया और कहा कि ऐसा कार्य तभी संभव होता है जब समाज का हर वर्ग योगदान देता है।
गोवर्धन प्रसंग से तुलना
अपने भाषण में उन्होंने पौराणिक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की घटना में सभी लोगों का योगदान था, वैसे ही राम मंदिर निर्माण भी सामूहिक प्रयास का परिणाम है। उन्होंने कहा कि “भगवान की शक्ति तभी सक्रिय होती है जब समाज उसमें अपना योगदान देता है।”
राम जन्मभूमि आंदोलन और राजनीतिक भूमिका
भागवत ने राम जन्मभूमि आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस आंदोलन ने देश को एक दिशा दी। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सत्ता में बैठे लोग इस कार्य के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होते, तो क्या मंदिर का निर्माण संभव होता।
उन्होंने वर्ष 2014 के आम चुनावों का भी संदर्भ दिया, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार बनी। भागवत के अनुसार, उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के राजनीतिक बदलाव को महत्वपूर्ण माना गया।
राष्ट्रीय पुनर्जागरण का संदर्भ
संघ प्रमुख ने भारत के पुनर्जागरण को सनातन धर्म के पुनरुत्थान से जोड़ा। उन्होंने अरविंदो घोष (योगी अरविंद) के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि भारत का उत्थान ही सनातन धर्म के उत्थान का आधार है।
उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया की शुरुआत 1857 से मानी जा सकती है, जब देश में पहली बार व्यापक स्तर पर स्वतंत्रता की भावना उभरी।
‘हिंदू राष्ट्र’ पर स्पष्ट रुख
भागवत ने कहा कि “हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है” और इसे घोषित करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने इसे एक स्वाभाविक सत्य बताते हुए कहा कि जैसे सूरज के पूर्व से उगने की घोषणा नहीं करनी पड़ती, वैसे ही भारत की पहचान को औपचारिक रूप देने की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले इस विचार का मजाक उड़ाया जाता था, लेकिन अब इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है।
सामूहिक योगदान पर जोर
संघ प्रमुख ने कहा कि राम मंदिर का निर्माण केवल एक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि इसकी मजबूत नींव देश के हर नागरिक के योगदान से तैयार हुई।
उन्होंने कहा, “हर व्यक्ति के प्रयास से ही यह कार्य संभव हुआ और आगे भी इसी तरह देश को मजबूत बनाना होगा।”
भविष्य की दिशा और अपील
अपने संबोधन के अंत में भागवत ने नागरिकों से देश को और अधिक मजबूत और समृद्ध बनाने के लिए योगदान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत का उत्थान केवल भारतीयों के प्रयास से ही संभव है और यह देश विश्व को दिशा देने की क्षमता रखता है।
उन्होंने कहा कि यदि सभी लोग मिलकर काम करें, तो यह लक्ष्य जल्दी हासिल किया जा सकता है और न्यूनतम नुकसान के साथ देश प्रगति कर सकता है।
मोहन भागवत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राम मंदिर और राष्ट्रीय पहचान को लेकर चर्चा लगातार जारी है। उनके विचारों ने एक बार फिर “हिंदू राष्ट्र” और भारत की सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में इस विषय पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया देखने को मिल सकती है।

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