
काउंटिंग ड्यूटी में केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति सही: सुप्रीम कोर्ट
टीएमसी की याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने अलग आदेश देने से किया इनकार, चुनाव आयोग की दलीलों को माना पर्याप्त
नई दिल्ली, 2 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना प्रक्रिया को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि काउंटिंग ड्यूटी में केंद्रीय और पीएसयू कर्मचारियों की नियुक्ति गलत नहीं है। कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस दलील को स्वीकार किया कि ड्यूटी पर लगाए गए हर कर्मचारी पर उसका पूर्ण नियंत्रण होता है, इसलिए यह मायने नहीं रखता कि कर्मचारी केंद्र का है या राज्य का।
यह मामला अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें पार्टी ने मतगणना के दौरान केवल केंद्रीय और सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) कर्मचारियों को सुपरवाइजर बनाए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। यह याचिका कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें टीएमसी की अपील खारिज कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची शामिल थे, ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान टीएमसी की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा।
कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा कि 13 अप्रैल को जारी किए गए सर्कुलर की जानकारी उन्हें 29 अप्रैल को मिली, जो प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चुनाव आयोग को हर सीट पर गड़बड़ी का अंदेशा नहीं होना चाहिए और इस आधार पर वह मनमाने तरीके से फैसले नहीं ले सकता।
इसके जवाब में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग के पास ड्यूटी पर तैनात हर कर्मचारी पर पूर्ण नियंत्रण होता है। उन्होंने कहा कि इस स्थिति में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि कर्मचारी केंद्र सरकार का है या राज्य सरकार का।
न्यायालय की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची ने भी इस मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि हर काउंटिंग सेंटर पर राजनीतिक दलों के एजेंट मौजूद रहते हैं, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह अपनी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार केंद्र या राज्य के कर्मचारियों में से काउंटिंग सुपरवाइजर और असिस्टेंट का चयन करे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संबंधित सर्कुलर में यह नहीं कहा गया है कि केवल केंद्रीय कर्मचारियों को ही नियुक्त किया जाएगा। लेकिन यदि ऐसा होता भी, तब भी इसे अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग की ओर से पेश वकील डी.एस. नायडू ने अदालत को बताया कि टीएमसी का संदेह निराधार है और आयोग पूरी तरह नियमों के अनुसार कार्य कर रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि कर्मचारियों की नियुक्ति करने वाला रिटर्निंग ऑफिसर स्वयं राज्य सरकार का अधिकारी होता है, जिससे संतुलन बना रहता है।
पृष्ठभूमि और विवाद
यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब चुनाव आयोग ने मतगणना के लिए केंद्रीय और पीएसयू कर्मचारियों की तैनाती का निर्णय लिया। टीएमसी ने इसे पक्षपातपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे राज्य के कर्मचारियों की अनदेखी हो रही है और प्रक्रिया पर संदेह पैदा हो सकता है।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने पहले ही इस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसके बाद टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में कोई अलग निर्देश देने से इनकार कर दिया और चुनाव आयोग की स्थिति को स्वीकार कर लिया।
आगे क्या?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब पश्चिम बंगाल में मतगणना प्रक्रिया तय दिशा में आगे बढ़ेगी। अदालत ने साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग को अपने अधिकार क्षेत्र में कर्मचारियों की नियुक्ति करने का पूरा अधिकार है।
इस निर्णय से यह भी संकेत मिलता है कि चुनाव से जुड़े प्रशासनिक मामलों में अदालत सीमित हस्तक्षेप करती है, जब तक कि कोई स्पष्ट कानूनी उल्लंघन न हो।

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