बिना वजह गिरफ्तारी गैरकानूनी: हाई कोर्ट का फैसला

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बिना वजह बताए गिरफ्तारी गैरकानूनी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

लखनऊ बेंच का बड़ा फैसला, बंदी को तत्काल रिहा करने का आदेश, यूपी सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना


लखनऊ, 2 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने बिना कारण बताए की गई गिरफ्तारी को गैरकानूनी करार देते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने उन्नाव निवासी एक व्यक्ति को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

यह मामला उन्नाव निवासी मनोज कुमार की गिरफ्तारी से जुड़ा है। उनके बेटे मुदित ने अपने पिता की गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पुलिस ने गिरफ्तारी के समय न तो कोई लिखित कारण दिया और न ही जरूरी दस्तावेज उपलब्ध कराए।

न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन की पीठ ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसके खिलाफ कार्रवाई के कारण लिखित रूप में बताना अनिवार्य है। ऐसा न करना व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

अदालत की टिप्पणी

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि गिरफ्तारी के दौरान केवल एफआईआर नंबर बताना पर्याप्त नहीं है। पुलिस को यह स्पष्ट करना होता है कि गिरफ्तारी किन आधारों पर की जा रही है। कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का उल्लंघन माना।

पीठ ने यह भी कहा कि कानून लागू करने वाले अधिकारियों को नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो यह न केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि न्याय व्यवस्था की मूल भावना के भी खिलाफ है।

जुर्माना और निर्देश

हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है और इसे चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को देने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने यह छूट भी दी है कि सरकार इस राशि को दोषी अधिकारियों से वसूल सकती है।

पृष्ठभूमि

बताया गया कि मनोज कुमार को 27 जनवरी को उन्नाव के असीवन थाना पुलिस ने एक मामले में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के समय पुलिस ने केवल एफआईआर नंबर बताया, लेकिन गिरफ्तारी के कारणों का कोई लिखित विवरण नहीं दिया।

इसके बाद 28 जनवरी को मजिस्ट्रेट ने उनका रिमांड मंजूर कर लिया था। हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया को हाई कोर्ट ने अवैध माना और रिमांड आदेश को भी रद्द कर दिया।

याचिकाकर्ता का पक्ष

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि गिरफ्तारी के समय कारणों की जानकारी न देना एक गंभीर कानूनी चूक है और यह व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने इस तर्क से सहमति जताते हुए याचिका को मंजूर कर लिया।

आगे क्या?

अदालत ने आदेश दिया है कि यदि मनोज कुमार किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। इस फैसले को नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


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