UAPA मामलों में बेल पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UAPA मामलों में भी बेल नियम और जेल अपवाद है। उमर खालिद केस के पुराने फैसले पर भी अदालत ने सवाल उठाए।


सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “UAPA में भी बेल नियम, जेल अपवाद”, उमर खालिद केस के फैसले पर जताई आपत्ति

दिल्ली दंगा मामलों में बेल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल, कहा- छोटे बेंच बड़े फैसलों को कमजोर नहीं कर सकते


नई दिल्ली, 18 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत गिरफ्तार आरोपियों की जमानत को लेकर बेहद अहम टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “बेल नियम है और जेल अपवाद”, और यह सिद्धांत UAPA जैसे कठोर कानूनों में भी लागू होता है। अदालत ने दिल्ली दंगा मामलों में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न दिए जाने से जुड़े पुराने फैसलों पर भी गंभीर सवाल उठाए।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर के एक UAPA आरोपी सैयद इफ्तिखार अंदराबी को जमानत देते हुए की। अंदराबी पिछले लगभग छह साल से जेल में बंद था और उसके खिलाफ एनआईए ने नार्को-टेरर मामले में कार्रवाई की थी।

“गुलफिशा फातिमा फैसले” पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर “गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य” मामले का उल्लेख किया। इसी फैसले के दौरान दिल्ली दंगों के कई आरोपियों को राहत मिली थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं दी गई थी। अदालत ने कहा कि उस फैसले में “KA नजीब” मामले के सिद्धांतों को सीमित करने की कोशिश की गई।

कोर्ट ने कहा कि “KA नजीब” फैसला साफ तौर पर यह कहता है कि अगर मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही है, तो आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने दोहराया कि संविधान का अनुच्छेद 21 यानी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार UAPA मामलों में भी पूरी तरह लागू होता है।

“UAPA का प्रतिबंध संविधान से ऊपर नहीं”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि UAPA की धारा 43D(5) जमानत पर रोक लगाने वाला प्रावधान जरूर है, लेकिन यह संविधान के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट कहा:

“हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि UAPA में भी बेल नियम है और जेल अपवाद।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि हर मामले के तथ्य अलग हो सकते हैं और गंभीर परिस्थितियों में जमानत रोकी जा सकती है, लेकिन सिर्फ कानून की कठोरता के आधार पर किसी को अनिश्चित समय तक जेल में रखना सही नहीं है।

छोटे बेंच बड़े फैसलों को कमजोर नहीं कर सकते

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अनुशासन पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि छोटे बेंच किसी बड़े बेंच के फैसले को कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकते। यदि किसी छोटे बेंच को बड़े फैसले पर संदेह हो, तो मामला बड़ी बेंच को भेजा जाना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में कुछ छोटे बेंच बड़े फैसलों की भावना को धीरे-धीरे कमजोर कर रहे हैं, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक है। अदालत ने कहा:

“यदि कोई छोटा बेंच बड़े बेंच से सहमत नहीं है, तो वह केवल मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास बड़ी बेंच के गठन के लिए भेज सकता है।”

क्या है KA नजीब मामला?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने “यूनियन ऑफ इंडिया बनाम KA नजीब” फैसले का हवाला दिया। इस मामले में तीन जजों की बेंच ने कहा था कि अगर UAPA के तहत किसी आरोपी का मुकदमा लंबे समय तक पूरा नहीं होता, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

अदालत ने सोमवार को कहा कि यह फैसला आज भी बाध्यकारी कानून है और इसे कोई छोटी बेंच कमजोर नहीं कर सकती।

अंदराबी केस में क्या आरोप हैं?

सैयद इफ्तिखार अंदराबी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले का रहने वाला है। एनआईए के मुताबिक वह सीमा पार से हेरोइन तस्करी और आतंकी संगठनों को फंडिंग करने वाले नेटवर्क का हिस्सा था। उस पर लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों को आर्थिक मदद पहुंचाने का आरोप है।

उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट, UAPA और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। उसे जून 2020 में गिरफ्तार किया गया था। ट्रायल अभी शुरुआती चरण में ही है।

UAPA मामलों में बेहद कम सजा दर पर भी चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि UAPA मामलों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम है। अदालत ने कहा कि देशभर में यह दर लगभग 2 से 6 प्रतिशत के बीच है, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह 1 प्रतिशत से भी कम रही है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में आरोपी अंत में बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक वे कई साल जेल में गुजार चुके होते हैं।

आगे क्या?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को UAPA मामलों में जमानत संबंधी कानून की नई व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर कई लंबित मामलों पर पड़ सकता है, खासकर उन मामलों पर जहां आरोपी लंबे समय से बिना ट्रायल पूरा हुए जेल में बंद हैं।


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