तमिलनाडु में सरकार गठन पर संकट: क्या TVK को सरकार बनाने से रोका जा रहा है?

TN-Government-formation-crisis तमिलनाडु में सरकार गठन पर संकट: क्या TVK को सरकार बनाने से रोका जा रहा है?

AI द्वारा बनाई गई सांकेतिक फ़ोटो


तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा के बाद TVK प्रमुख थलपति विजय को सरकार बनाने का न्योता नहीं मिलने पर संवैधानिक बहस तेज। जानिए बहुमत, फ्लोर टेस्ट और गवर्नर की भूमिका पर पूरा विश्लेषण।


तमिलनाडु में सत्ता का नया गणित: क्या राजभवन तय करेगा बहुमत, या सदन?

द्रविड़ राजनीति के बाद का पहला बड़ा संवैधानिक इम्तिहान


तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय तक एक स्थिर “द्रविड़ियन डुओपोली” — DMK और AIADMK — के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन 2026 का जनादेश उस पुराने ढांचे को तोड़ चुका है। अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी TVK का सबसे बड़े दल के रूप में उभरना केवल चुनावी बदलाव नहीं, बल्कि राज्य की राजनीतिक संस्कृति में एक संरचनात्मक परिवर्तन है। और अब इस परिवर्तन का पहला बड़ा परीक्षण राजभवन बनाम विधानसभा की बहस में दिखाई दे रहा है।

मुद्दा सीधा है, लेकिन उसके संवैधानिक निहितार्थ गहरे हैं। क्या सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर मिलना चाहिए, भले ही उसके पास तत्काल स्पष्ट बहुमत न हो? या फिर राज्यपाल 118 विधायकों की लिखित सूची की शर्त रख सकते हैं? यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति, संविधान और परंपरा एक-दूसरे से टकराते दिख रहे हैं।

107 सीटों का पेच और बहुमत का वास्तविक गणित

स्थिति को समझना जरूरी है। TVK ने 108 सीटें जीतीं, लेकिन विजय दो सीटों — पेरम्बूर और त्रिची ईस्ट — से विजयी हुए हैं। संवैधानिक नियमों के अनुसार उन्हें एक सीट छोड़नी होगी। इसका अर्थ है कि सदन की प्रभावी संख्या 233 और TVK की संख्या 107 हो जाएगी।

कांग्रेस के 5 विधायकों के समर्थन के बाद यह आंकड़ा 112 तक पहुँचता है। यानी बहुमत के लिए जरूरी 117 से अभी भी 5 कम।

यहीं से विवाद शुरू होता है। तमिलनाडु के गवर्नर का कथित रुख यह है कि जब तक 118 विधायकों का स्पष्ट समर्थन पत्र नहीं दिया जाएगा, TVK को सरकार बनाने का निमंत्रण नहीं मिलेगा। पहली नजर में यह “स्थिरता” का तर्क लग सकता है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र की बुनियादी परंपराएँ इससे अधिक जटिल हैं।

संविधान “पूर्ण बहुमत” नहीं, “सदन का विश्वास” मांगता है

भारतीय संविधान में कहीं नहीं लिखा कि केवल “Majority Government” ही वैध होगी। संसदीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि सरकार को सदन का विश्वास प्राप्त होना चाहिए। यह विश्वास Floor Test से साबित होता है, न कि केवल कागज़ी समर्थन पत्रों से।

यही कारण है कि भारत में अल्पमत सरकारों का लंबा इतिहास रहा है।

1991 में पीवी नरसिंह राव की सरकार पूर्ण बहुमत में नहीं थी, फिर भी उसने अपना कार्यकाल पूरा किया। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे बड़े दल के नेता के रूप में सरकार बनाने का अवसर मिला, भले ही उनके पास तत्काल बहुमत नहीं था। 2018 में कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा को भी इसी तर्क पर बुलाया गया था। महाराष्ट्र 2019 का घटनाक्रम भी इसी संवैधानिक बहस का हिस्सा बना।

इन सभी मामलों में एक साझा सिद्धांत था: अंतिम फैसला सदन में होगा।

“118” का आंकड़ा क्यों अंतिम सत्य नहीं है

भारतीय संसदीय प्रणाली में विश्वास मत “Effective Majority” के आधार पर तय होता है — यानी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर।

यही वह तकनीकी लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है जिसे राजनीतिक बहस में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

हर विधायक के पास तीन विकल्प होते हैं:

  • पक्ष में मतदान (Yes)
  • विरोध में मतदान (No)
  • मतदान से दूर रहना (Abstain)

Abstain करना पूरी तरह वैध संसदीय अधिकार है। यदि कुछ विधायक मतदान में हिस्सा नहीं लेते, तो आवश्यक बहुमत का आंकड़ा स्वतः घट जाता है।

उदाहरण के लिए, यदि 233 सदस्यीय सदन में 10 सदस्य मतदान से अनुपस्थित रहते हैं, तो प्रभावी मतदान संख्या 223 होगी और बहुमत का आंकड़ा 112 रह जाएगा। ऐसी स्थिति में TVK अपने वर्तमान समर्थन के साथ भी विश्वास मत जीत सकती है।

इसीलिए केवल यह कहना कि “पहले 118 विधायक दिखाइए, तभी निमंत्रण मिलेगा” संसदीय गणित की पूरी तस्वीर नहीं दर्शाता।

एस.आर. बोम्मई से सरकारिया आयोग तक: परंपरा क्या कहती है?

भारतीय संवैधानिक इतिहास में राज्यपाल की भूमिका हमेशा विवाद का विषय रही है। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न आयोगों ने समय-समय पर दिशानिर्देश दिए।

एस.आर. बोम्मई केस ने स्पष्ट किया कि बहुमत का परीक्षण सदन में होना चाहिए। सरकारिया आयोग ने सिफारिश की थी कि त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में राज्यपाल को प्राथमिकता क्रम के आधार पर सबसे बड़े दल या गठबंधन को अवसर देना चाहिए।

यह परंपरा इसलिए बनी क्योंकि लोक भवन को “राजनीतिक निर्णायक” बनने से रोकना लोकतांत्रिक संतुलन के लिए आवश्यक माना गया।

यदि कोई वैकल्पिक गठबंधन स्पष्ट बहुमत का दावा नहीं कर रहा, तो सबसे बड़े दल को मौका देना सामान्य संवैधानिक व्यवहार माना गया है।

तमिलनाडु के वर्तमान परिदृश्य में भी यही प्रश्न उठ रहा है: यदि TVK सबसे बड़ा दल है और कोई अन्य गठबंधन बहुमत का दावा पेश नहीं कर रहा, तो क्या उसे Floor Test का अवसर नहीं मिलना चाहिए?

लेकिन क्या राज्यपाल पूरी तरह गलत हैं?

यह कहना भी अतिरंजना होगी कि राज्यपाल के पास कोई विवेकाधिकार नहीं है। संविधान उन्हें कुछ सीमित परिस्थितियों में निर्णय लेने का अधिकार देता है, विशेषकर तब जब राजनीतिक अस्थिरता की आशंका हो।

यदि किसी दल के पास न्यूनतम समर्थन का भी कोई संकेत न हो, तो राज्यपाल समर्थन के प्रमाण मांग सकते हैं। उनका दायित्व केवल सरकार बनवाना नहीं, बल्कि संवैधानिक स्थिरता सुनिश्चित करना भी है।

लेकिन यही विवेकाधिकार तब विवादास्पद हो जाता है जब वह “परीक्षण” की जगह “पूर्व-निर्णय” जैसा दिखने लगे।

भारतीय संवैधानिक परंपरा का मूल संदेश यही रहा है कि राजभवन संभावनाओं का दरवाजा बंद नहीं करेगा; वह अंतिम परीक्षण सदन पर छोड़ेगा।

असली सवाल: स्थिरता बनाम लोकतांत्रिक अवसर

तमिलनाडु की यह स्थिति केवल संख्याओं का खेल नहीं है। यह उस बड़े प्रश्न का हिस्सा है कि लोकतंत्र में जनादेश की व्याख्या कौन करेगा — निर्वाचित सदन या नियुक्त संवैधानिक पद?

TVK को अवसर देना इस बात की गारंटी नहीं कि सरकार टिकेगी। लेकिन अवसर न देना यह संकेत जरूर दे सकता है कि राजभवन राजनीतिक स्थिरता की अपनी परिभाषा को संसदीय प्रक्रिया से ऊपर रख रहा है।

और यही वह रेखा है जहाँ लोकतांत्रिक मर्यादा की परीक्षा शुरू होती है।

बहुमत का फैसला विधानसभा में होना चाहिए

तमिलनाडु आज केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं देख रहा, बल्कि संवैधानिक व्यवहार की भी नई परीक्षा से गुजर रहा है। राज्यपाल समर्थन के संकेत मांग सकते हैं, यह उनका अधिकार है। लेकिन केवल इसलिए कि 118 विधायकों की लिखित सूची उपलब्ध नहीं है, सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर न देना भारतीय संसदीय परंपराओं की भावना के विपरीत माना जा सकता है — विशेषकर तब, जब कोई अन्य गठबंधन स्पष्ट बहुमत का दावा पेश नहीं कर रहा हो।

लोकतंत्र में सत्ता का अंतिम वैधता-पत्र लोक भवन से नहीं, सदन से आता है। और बहुमत की असली गिनती कागज़ पर नहीं, विधानसभा के फ्लोर पर होती है।


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