एसआईआर ट्रिब्यूनल से टीएस शिवज्ञानम का इस्तीफा, मतदाता शिकायत सुनवाई प्रक्रिया पर सवाल

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कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम ने एसआईआर ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया है। व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को भी इस्तीफा भेजा।


एसआईआर ट्रिब्यूनल से पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम का इस्तीफा, प्रक्रिया पर उठे नए सवाल

व्यक्तिगत कारणों का हवाला देकर छोड़ी जिम्मेदारी, सुप्रीम कोर्ट को भी भेजा इस्तीफा


कोलकाता, 7 मई  (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): कलकत्ता उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवज्ञानम ने एसआईआर ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दे दिया है। आयोग की ओर से जारी जानकारी में कहा गया है कि उन्होंने “व्यक्तिगत कारणों” का हवाला देते हुए अपने पद से हटने का निर्णय लिया।

टीएस शिवज्ञानम उस ट्रिब्यूनल के सदस्य थे, जिसे एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से बाहर किए गए लोगों की शिकायतों और पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के लिए गठित किया गया था। उनके इस्तीफे के बाद अब इस पूरी प्रक्रिया की दिशा और ट्रिब्यूनल की आगे की कार्यप्रणाली को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।

जानकारी के अनुसार, इस ट्रिब्यूनल का गठन कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल के निर्देश पर किया गया था। याचिकाओं के निपटारे की प्रक्रिया तय करने और शिकायतों की सुनवाई को व्यवस्थित रूप देने के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी। इस समिति में टीएस शिवज्ञानम की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।

समिति के अन्य सदस्यों में सेवानिवृत्त न्यायाधीश प्रदीप रॉय और प्रणब कुमार देब शामिल हैं। अब शिवज्ञानम के हटने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही किस प्रकार आगे बढ़ेगी और क्या समिति का पुनर्गठन किया जाएगा।

एसआईआर प्रक्रिया को लेकर पहले से ही राजनीतिक और कानूनी बहस जारी रही है। मतदाता सूची से नाम हटने की शिकायतों को देखते हुए बड़ी संख्या में पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं। इन्हीं मामलों की सुनवाई और समाधान के लिए इस विशेष तंत्र को बनाया गया था। ऐसे समय में ट्रिब्यूनल के एक प्रमुख सदस्य का इस्तीफा प्रक्रिया की पारदर्शिता और निरंतरता पर भी चर्चा को तेज कर सकता है।

हालांकि, आयोग की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि शिवज्ञानम के स्थान पर किसी नए सदस्य की नियुक्ति कब की जाएगी। साथ ही, लंबित मामलों की सुनवाई पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इस संबंध में भी कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि बड़ी संख्या में प्रभावित मतदाता फैसले का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में ट्रिब्यूनल की संरचना में बदलाव से मामलों के निपटारे की गति प्रभावित हो सकती है।

फिलहाल सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च न्यायालय और संबंधित प्राधिकरण आगे क्या कदम उठाते हैं। आने वाले दिनों में ट्रिब्यूनल के पुनर्गठन या नई नियुक्ति को लेकर औपचारिक घोषणा होने की संभावना जताई जा रही है।


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