
पश्चिम बंगाल विधानसभा भंग होने के बाद BJP सरकार गठन की तैयारी में। ममता बनर्जी ने हार मानने से इनकार किया।
पश्चिम बंगाल विधानसभा भंग, BJP सरकार गठन का रास्ता साफ
ममता बनर्जी ने हार मानने से किया इनकार, राज्यपाल के आदेश के बाद संवैधानिक बहस तेज
कोलकाता, 7 मई (जग वाणी न्यूज़ डेस्क): पश्चिम बंगाल में राजनीतिक घटनाक्रम ने गुरुवार को बड़ा मोड़ ले लिया, जब राज्यपाल R. N. Ravi ने विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी। इसके साथ ही राज्य में नई सरकार के गठन का रास्ता साफ हो गया है। भारतीय जनता पार्टी को हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिला है।
राज्यपाल की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) के तहत प्राप्त अधिकारों का उपयोग करते हुए 7 मई 2026 से पश्चिम बंगाल विधानसभा को भंग किया जाता है। विधानसभा का पांच वर्षीय कार्यकाल भी इसी दिन समाप्त हुआ।
चुनाव परिणामों के अनुसार, Mamata Banerjee के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस को 293 सीटों में से केवल 80 सीटें मिलीं। वहीं भाजपा ने 207 सीटों पर जीत दर्ज कर प्रचंड बहुमत हासिल किया। सरकार बनाने के लिए 147 सीटों की आवश्यकता थी। फलता विधानसभा सीट पर “गंभीर चुनावी अनियमितताओं” के आरोपों के चलते चुनाव रद्द कर दिया गया।
ममता बनर्जी ने परिणाम मानने से किया इनकार
चुनावी हार के बावजूद ममता बनर्जी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया। उन्होंने चुनाव परिणामों को “जनादेश नहीं बल्कि साजिश” बताया।
ममता बनर्जी ने कहा कि वह राजभवन नहीं जाएंगी और न ही इस्तीफा देंगी। उनके अनुसार चुनावी प्रक्रिया में लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के माध्यम से उनकी पार्टी को हराने की कोशिश की गई।
उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी Gyanesh Kumar पर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि चुनाव प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के दुरुपयोग की आशंका है।
हालांकि भाजपा और चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया। भाजपा नेताओं ने कहा कि जनता ने स्पष्ट जनादेश दिया है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना जनादेश का अपमान है।
संवैधानिक स्थिति क्या कहती है?
ममता बनर्जी का इस्तीफा न देना अब संवैधानिक बहस का विषय बन गया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 172 किसी भी विधानसभा का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित करता है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद विधानसभा स्वतः समाप्त मानी जाती है या उसे भंग किया जा सकता है।
वहीं अनुच्छेद 164 के अनुसार मुख्यमंत्री पद पर वही व्यक्ति बना रह सकता है, जिसे विधानसभा में बहुमत का समर्थन प्राप्त हो। चूंकि तृणमूल कांग्रेस स्पष्ट रूप से बहुमत खो चुकी है, इसलिए संवैधानिक रूप से सरकार के बने रहने की स्थिति कमजोर मानी जा रही थी।
संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, विधानसभा भंग होने और चुनाव परिणाम अधिसूचित होने के बाद राज्यपाल को बहुमत दल को सरकार गठन के लिए आमंत्रित करने का अधिकार होता है। इस स्थिति में भाजपा सबसे बड़ी और स्पष्ट बहुमत वाली पार्टी है।
भाजपा सरकार गठन की तैयारी में
भाजपा की जीत को राज्य की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव माना जा रहा है। लंबे समय तक वामपंथी शासन और उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के प्रभुत्व वाले बंगाल में पहली बार भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने जा रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, विधायक दल की बैठक जल्द बुलाई जा सकती है, जिसमें मुख्यमंत्री पद के लिए नेता का चयन होगा। इसके बाद राज्यपाल नई सरकार को शपथ दिला सकते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। भाजपा ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन किया है।
चुनाव परिणामों पर विवाद जारी
तृणमूल कांग्रेस अभी भी चुनाव परिणामों को चुनौती देने की तैयारी में दिखाई दे रही है। पार्टी के कई नेताओं ने मतगणना प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। हालांकि अब तक किसी अदालत या निर्वाचन प्राधिकरण ने चुनाव परिणामों में व्यापक गड़बड़ी की पुष्टि नहीं की है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि तृणमूल कांग्रेस कानूनी लड़ाई लड़ना चाहती है, तो उसे अदालत का रास्ता अपनाना होगा। केवल राजनीतिक बयानबाजी से चुनाव परिणामों को पलटना संभव नहीं होगा।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि भाजपा सरकार का गठन कब तक होता है और क्या तृणमूल कांग्रेस विपक्ष की भूमिका स्वीकार करती है या नहीं। राज्यपाल की अधिसूचना के बाद संवैधानिक प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ने की उम्मीद है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में और अधिक गर्म हो सकती है, क्योंकि एक ओर भाजपा सत्ता संभालने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस चुनावी हार को लेकर आक्रामक रुख बनाए हुए है।
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