| (बाएं से दायें) डॉ फ्रांको बी, डॉ ईश्वर गिलाडा, डॉ शेरोन लेविन, डॉ नवल चन्द्र (एसीकॉन 2017) |
भारत में जब एचआईवी से संक्रमित पहले व्यक्ति को 1986 में चिन्हित किया गया तो सर्वप्रथम चिकित्सक जो एचआईवी इलाज और देखभाल के लिए आगे आये उनमें डॉ ईश्वर गिलाडा का नाम प्रमुख रहा है. डॉ गिलाडा ने सिटीजन न्यूज़ सर्विस (सीएनएस) से कहा कि यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य पूरे करने हैं तो अप्रत्याशित और ठोस कदम उठाने होंगे. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2016 तक भारत में अनुमानित 21 लाख एचआईवी पॉजिटिव लोगों में से 14 लाख (67%) को यह ज्ञात था कि वे संक्रमित हैं. इन 14 लाख एचआईवी संक्रमित लोगों में से 9 लाख (65% से कम) को एंटीरेट्रोवायरल दवा (एआरटी) मिल रही थी. जन स्वास्थ्य की दृष्टि से यह अत्यंत जरुरी है कि सभी एचआईवी से ग्रसित लोगों को उनके संक्रमण के बारे में जानकारी हो, उन्हें एआरटी दवाएं मिल रही हों, और उनका वायरल लोड नगण्य रहे, अन्यथा एचआईवी रोकधाम में जो प्रगति हुई है वो पलट सकती है, जो नि:संदेह अवांछनीय होगा.
वैज्ञानिक शोध ने यह प्रमाणित किया है कि यदि एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति नियमित रूप से जीवन-रक्षक एआरटी दवाएं ले रहा हो और उसका वायरल लोड नगण्य रहे (वायरल लोड, जांच में पता नहीं लग रहा हो) तो उससे किसी अन्य को एचआईवी संक्रमण फैलने का खतरा भी नगण्य रहता है और वो स्वयं स्वस्थ और सामान्य ज़िन्दगी जी सकता है. चूँकि भारत में अभी वायरल लोड जांच करने की क्षमता अत्यंत कम है जिसके कारणवश जिन 9,02,868 लोगों को एआरटी मिल रही है उनके वायरल लोड के बारे में जानकारी ही नहीं है. एसीकॉन 2017 के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के लक्ष्य पूरे करने हैं तो बिना विलम्ब यह सुनिश्चित करना होगा कि हर एचआईवी के साथ जीवित व्यक्ति को एआरटी मिल रही हो, उसकी वायरल लोड जांच हो रही हो और वायरल लोड नगण्य रहे.
2015 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 86,000 नए एचआईवी संक्रमण हुए जिनमें 15 साल से कम उम्र के बच्चे 12% थे (10,400).

ग़ज़नफ़र एक प्रतिष्ठित पत्रकार, लेखक, शोधकर्ता और मीडिया सलाहकार हैं। उनके पास पत्रकारिता के क्षेत्र में व्यापक अनुभव है और उन्होंने विभिन्न मीडिया आउटलेट्स के साथ काम किया है। ग़ज़नफ़र की लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और सूचनात्मक है, जो उन्हें पाठकों के बीच लोकप्रिय बनाती है। ग़ज़नफ़र की रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक क्षमता उनके लेखन और शोध में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे विभिन्न विषयों पर लिखते हैं और विभिन्न संगठनों को मीडिया से सम्बंधित विषयों पर परामर्श प्रदान करते हैं।
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