
धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कें जाम नहीं होंगी: सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने कहा—पूजा पद्धति में स्वायत्तता बरकरार, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था बाधित नहीं की जा सकती
नई दिल्ली, 29 अप्रैल जग वाणी न्यूज़ डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट किया कि धार्मिक गतिविधियों के नाम पर सड़कों को अवरुद्ध करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि किसी भी धार्मिक समुदाय को अपनी पूजा पद्धति अपनाने की स्वतंत्रता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था और आम नागरिकों के अधिकारों के ऊपर नहीं हो सकती।
सुनवाई के दौरान अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता एक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है, लेकिन इसका उपयोग इस तरह नहीं होना चाहिए जिससे आम लोगों की आवाजाही या दैनिक जीवन प्रभावित हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी धर्म या संप्रदाय की आस्था या पूजा पद्धति का मूल्यांकन नहीं कर सकती।
मामले की सुनवाई के नौवें दिन, हिंदू धर्म आचार्य सभा की ओर से पेश अधिवक्ता अक्षय नागराजन ने दलील दी कि सरकार को धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, खासकर जब बात संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता की हो।
अनुच्छेद 25 पर बहस
बहस के दौरान अनुच्छेद 25(2)(a) की व्याख्या प्रमुख मुद्दा रही। यह प्रावधान राज्य को धार्मिक प्रथाओं से जुड़े आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य सांसारिक गतिविधियों को विनियमित करने का अधिकार देता है।
अधिवक्ता नागराजन ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाला संरक्षण केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक परंपराओं और उनसे जुड़ी गतिविधियों को भी शामिल करता है। उनका तर्क था कि सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल कर धार्मिक स्वतंत्रता को सीमित नहीं कर सकती।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि यदि किसी धार्मिक गतिविधि से आम जनता को असुविधा होती है, तो राज्य को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
एक न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि “धार्मिक आस्था का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सार्वजनिक सड़कों को स्थायी या अस्थायी रूप से बाधित किया जाए।”
पृष्ठभूमि और संदर्भ
पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में धार्मिक आयोजनों, जुलूसों और प्रार्थना सभाओं के दौरान सड़कों के अवरोध की घटनाएं बढ़ी हैं। इससे यातायात व्यवस्था प्रभावित होती है और आम नागरिकों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
इसी संदर्भ में कई याचिकाएं अदालत में दायर की गई थीं, जिनमें सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई थी।
विवाद की टाइमलाइन
- विभिन्न राज्यों में धार्मिक आयोजनों के दौरान सड़क जाम की घटनाएं
- इस मुद्दे पर अदालत में कई याचिकाएं दायर
- सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 25 और राज्य के अधिकारों पर बहस
- नौवें दिन सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी सामने आई
आगे क्या
मामले की सुनवाई अभी जारी है और आने वाले दिनों में अदालत विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर सकती है। इससे यह तय होगा कि धार्मिक गतिविधियों और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका दायरा असीमित नहीं है। सार्वजनिक हित और नागरिकों की सुविधा को प्राथमिकता देते हुए संतुलन बनाना ही इस मामले का मुख्य केंद्र है।

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